इस पहेली को मेघालय में मावमुह गुफा में स्टेलेग्माइट (गुफा में पानी के टपकने से बने चूने के स्तंभ) के अध्ययन से बहुत हद तक सुलझाया गया है। इसके महत्व को देखते हुए ही इंटरनेशनल कमीशन ऑफ स्ट्राटीग्राफी (आईसीएस) ने 1950 को आधार वर्ष मानते हुए 4200 साल पहले के काल खंड को मेघालय स्टेज का नाम देने का प्रस्ताव दिया था। इस प्रस्ताव को इंटरनेशनल यूनियन आफ जियोलाजिकल साइंस ने स्वीकार कर लिया है। इस तरह से देखा जाए तो भू वैज्ञानिक कालक्रम में अब भारत का नाम भी जुड़ गया है।
नैनीताल में पली बढ़ी और इस समय चीन के झियान जियाटांग विश्वविद्यालय में भारतीय मानसून के शोध की मुख्य शोधार्थी गायत्री कठायत के इसमें योगदान को आइसीएस ने भी स्वीकार किया है। गायत्री ही है जिसने मेघालय की गुफा से यह सैंपल जुटाया ओर अन्य शोधार्थियों की टीम के साथ मिलकर इसका अध्ययन किया। गायत्री के मुताबिक इस सैंपल के विश्लेषण की मदद से अब हम भारतीय मानसून के 4200 साल पहले की स्थिति को और भी बेहतर तरीके से जानते हैं। अब हम और अधिक विश्वास के साथ यह कह सकते हैं कि 4200 साल पहले के सूखे ने सातों महाद्वीपों को प्रभावित किया था। यह सूखा करीब 200 साल रहा और इसकी वजह से कई कृषि आधारित सभ्यताओं को जड़ से उखड़ना पड़ा।
200 साल में भारतीय मानसून में रहा खासा उतार चढ़ाव
गायत्री के मुताबिक 4200 साल पहले के सूखे के तीन चरण थे। पहले चरण में मानसून कमजोर हुआ और शुष्क मौसम रहा। फिर कुछ समय तक मानसून बेहद सक्रिय हुआ और फिर सूखा पड़ा। 200 साल के सूखे के बजाय यह बीच-बीच में 40 साल तक अधिकतम रहा।