भारत-चीन सीमा पर दोनों देशों के बीच व्यापार की परंपरा सदियों पुरानी हैं। वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद यह व्यापार बंद हो गया था। 1992 में करीब 32 साल बाद दोनों देशों की सहमति से इसे फिर से शुरू किया गया। व्यापार के लिए एक जून से 30 सितंबर की तिथि तय है। हालांकि कई बार इसे बढ़ाकर 31 अक्तूबर कर दिया जाता है। व्यापार के दौरान सहायक ट्रेड अधिकारी गुंजी में कार्य करते हैं। शेष अवधि में धारचूला में कार्य चलता है। व्यापार संचालन के लिए कालापानी में कस्टम चौकी और गुंजी में स्टेट बैंक की शाखा भी खोली जाती है।
व्यापारी घोड़े खच्चरों से लादकर पहुंचाते है तकलाकोट सामग्री
दोनों देशों के बीच घटते व्यापार की एक बड़ी वजह व्यापारियों की समस्याएं भी हैं। चीन ने तकलाकोट मंडी तक सड़क पहुंचा दी है। चीनी व्यापारी आसानी से मंडी तक सामान पहुंचाते हैं। लेकिन भारत लिपुलेख तक वर्ष 2020 में सड़क पहुंचा पाया है। यहां पर व्यापारी घोड़े खच्चरों में सामान लादकर तकलाकोट पहुंचाते हैं। वर्षाकाल में व्यापारियों का अधिकांश सामान तकलाकोट पहुंचते-पहुंचते खराब भी हो जाता है। इससे उन्हें काफी नुकसान झेलना पड़ता है।
वर्ष 2002 के बाद नहीं आया कोई भी चीनी व्यापारी
भारत-चीन व्यापार को लेकर चीन के व्यापारियों में कोई उत्साह नहीं है। वर्ष 2002 के बाद से आज तक किसी भी चीनी व्यापारी ने व्यापार के लिए गुंजी में कदम नहीं रखा है। लेकिन भारतीय व्यापारी प्रत्येक वर्ष व्यापार के लिए चीन जाते हैं।
इन चीजों का होता है व्यापार
गुड़, मिश्री, कॉस्मेटिक सामान, एल्यूमीनियम के बर्तन, कॉफी, टाफियां, सुर्ती, ऊन, तिब्बती चाय, छिरबी, याक की पूंछ, जैकेट, कंबल, जूते, चीन निर्मित रजाइयां आदि।