आजादी के इस महायज्ञ में नगर के दो नाबालिग बाडियूं गांव के प्रताप सिंह व छावनी नगर के चैथमल खंडेलवाल की सक्रिय भागेदारी बेमिसाल रही। जिन्होंने ब्रिटिश हुक्मरानों की आंखों में धूल झोंककर अग्रेंजी राज के खिलाफ लोगों में जनजागृति जगाने के लिए गढ़वाल के गांव -गांव जाकर लोगों को लामबंद करने का काम किया था।
लैंसडौन के निकटवर्ती गांव चमेठाखाल, दुगडडा, नाथपुरा गांव, बाडियूं के गोविंद प्रसाद खंतवाल, गंगासिंह त्यागी, जेठवा सिंह भी आजादी की अलख जागने का काम कर रहे थे। आंदोलन की प्रेरणा देने के लिए जगह-जगह बैठकों का आयोजन भी करते थे। इन लोगों ने आजादी के मतवालों की गुप्त बैठकों के लिए साझा सैंण नामक जंगल में गुप्त स्थान भी तय किया हुआ था। जहां आंदोलनकारी जुट कर अपने मंसूबों को धरातल पर उतारने की रणनीति तय करते थे।
इस दौरान लैंसडौन में टेकचंद्र मक्खनलाल, लक्ष्मीनारायण शर्मा, नानूमल, राधेबल्लभ जोशी, रूपचंद्र वर्मा की दुकानों पर तिरंगा लहराने के जुर्म में इन पर अर्थदंड लगाया गया। रूपचंद्र वर्मा, कन्हैयालाल खंडेलवाल, लक्ष्मीनारायण शर्मा की दुकानों पर रेडियो बर्मा सुनने के लिए जमा भीड़ को तितर बितर करने को पुलिस को लाठियां चलानी पड़ती थी।
करो या मरो आंदोलन को कुचलने के लिए सरकार ने रूपचंद्र वर्मा को एक वर्ष का कारावास तथा 25 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई, भारत छोड़ो आंदोलन में रूपचंद्र वर्मा को 18 माह, भक्तदर्शन को एक वर्ष, कन्हैयालाल खंडेलवाल को 12 माह के कारावास की सजा सुनाई गई। लेकिन, आंदोलनकारियों पर होने वाली दमनात्मक कार्रवाई से आंदोलन की धार ओर तेज होती गई।