फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

स्वतंत्रता दिवस 2019: जब लैंसडौन की वादियों में गूंजा था 'करो या मरो' का उद्घोष

Thu, 15 Aug 2019 09:02 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal कुलदीप खंडेलवाल, अमर उजाला, लैंसडौन
विज्ञापन
- फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर
विज्ञापन

देश को आजादी दिलाने में लैंसडौन के आंदोलनकारियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। सन 1942 के करो या मरो और अंग्रेज भारत छोड़ो, आंदोलनों में लैंसडौन के कांग्रेसी नेता ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ कूद पड़े थे। उस समय लैंसडौन छावनी ब्रिटिश सरकार का महत्वपूर्ण सैन्य स्थल था। अंग्रेज अधिकारियों को आंदोलन व आंदोलनकारियों को कुचलने के लिए अपनी पूरी ताकत लगानी पड़ी थी।

विज्ञापन


आंदोलनकारियों के परिजन लैंसडौन निवासी रामदास गुप्ता और पूर्व प्रधानाचार्य सुरेश वर्मा ने बताया कि अंग्रेजों से देश को आजाद कराने के लिए लैंसडौन के अग्रणी शीर्षस्थ नेताओं में भैरवदत्त धूलिया, रुपचंद्र वर्मा, कन्हैयालाल खंडेलवाल, भक्तदर्शन, शीशराम पोखरियाल, हरिराम शर्मा, रामप्रसाद नौटियाल, बलदेव सिंह आर्य, जगमोहन सिंह नेगी, लक्ष्मीनारायण शर्मा, ईश्वरी प्रसाद नैथानी, वकील नैन सिंह नेगी आदि लोग आगे थे।
 

गढ़वाल के गांव -गांव जाकर लोगों को लामबंद किया

आजादी के इस महायज्ञ में नगर के दो नाबालिग बाडियूं गांव के प्रताप सिंह व छावनी नगर के चैथमल खंडेलवाल की सक्रिय भागेदारी बेमिसाल रही। जिन्होंने ब्रिटिश हुक्मरानों की आंखों में धूल झोंककर अग्रेंजी राज के खिलाफ लोगों में जनजागृति जगाने के लिए गढ़वाल के गांव -गांव जाकर लोगों को लामबंद करने का काम किया था।

लैंसडौन के निकटवर्ती गांव चमेठाखाल, दुगडडा, नाथपुरा गांव, बाडियूं के गोविंद प्रसाद खंतवाल, गंगासिंह त्यागी, जेठवा सिंह भी आजादी की अलख जागने का काम कर रहे थे। आंदोलन की प्रेरणा देने के लिए जगह-जगह बैठकों का आयोजन भी करते थे। इन लोगों ने आजादी के मतवालों की गुप्त बैठकों के लिए साझा सैंण नामक जंगल में गुप्त स्थान भी तय किया हुआ था। जहां आंदोलनकारी जुट कर अपने मंसूबों को धरातल पर उतारने की रणनीति तय करते थे।
विज्ञापन

तिरंगा लहराने के जुर्म में अर्थदंड लगाया गया

इस दौरान लैंसडौन में टेकचंद्र मक्खनलाल, लक्ष्मीनारायण शर्मा, नानूमल, राधेबल्लभ जोशी, रूपचंद्र वर्मा की दुकानों पर तिरंगा लहराने के जुर्म में इन पर अर्थदंड लगाया गया। रूपचंद्र वर्मा, कन्हैयालाल खंडेलवाल, लक्ष्मीनारायण शर्मा की दुकानों पर रेडियो बर्मा सुनने के लिए जमा भीड़ को तितर बितर करने को पुलिस को लाठियां चलानी पड़ती थी।

करो या मरो आंदोलन को कुचलने के लिए सरकार ने रूपचंद्र वर्मा को एक वर्ष का कारावास तथा 25 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई, भारत छोड़ो आंदोलन में रूपचंद्र वर्मा को 18 माह, भक्तदर्शन को एक वर्ष, कन्हैयालाल खंडेलवाल को 12 माह के कारावास की सजा सुनाई गई। लेकिन, आंदोलनकारियों पर होने वाली दमनात्मक कार्रवाई से आंदोलन की धार ओर तेज होती गई।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें