फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

इटली को भाया आईआईटी रुड़की का भूस्खलन वार्निंग सिस्टम, मोबाइल पर ऐसे करेगा काम

Thu, 10 Jan 2019 12:23 PM IST
अलका त्यागी अंकित कुमार गर्ग/अमर उजाला, रुड़की
विज्ञापन
landslide - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
विज्ञापन

वैज्ञानिकों के जिन आविष्कारों को देश में अहमियत नहीं दी जाती, उन्हें विदेशों में हाथोंहाथ लिया जा रहा है। उत्तराखंड के खिसकते पहाड़ों के लिए एसएमएस के जरिये चेतावनी जारी करने की आईआईटी रुड़की की जो तकनीक महत्वपूर्ण हो सकती थी, वह इटली को कई साल पहले भा गई और वहां इसका प्रयोग भी शुरू हो चुका है। इसी तरह के कई आटोमैटिक सिस्टम और डिसीजन सपोर्ट सिस्टम विकसित करने पर वैज्ञानिक को बेस्ट थीसिस समेत कई महत्वपूर्ण अवार्ड भी मिल चुके हैं।

विज्ञापन

 
आईआईटी रुड़की के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के वैज्ञानिक डॉ. जयंत कुमार घोष 1985 से जियो स्पेशियल टेक्नोलॉजी विकसित करने के लिए काम कर रहे हैं। कुछ वर्षों पहले उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन पर अर्ली वार्निंग कम्यूनिकेशन सिस्टम विकसित किया, जो नासा के टीआरएमएम (ट्रॉपिकल रेनफॉल मेजरिंग मिशन) सेटेलाइट से प्राप्त बारिश के डाटा और अन्य जानकारी के आधार पर एसएमएस के जरिये चेतावनी जारी करता है।

इस सिस्टम को जियो वार्न नाम दिया गया है। डॉ. जयंत बताते हैं कि आईआईटी और इटली की पॉलीटेक्निको डी टोरीनो यूनिवर्सिटी बीच शोध समझौते के तहत वर्ष 2010 में उनकी इस तकनीक पर प्रोफेसर पियरो बोकॉर्डो ने काम शुरू किया। साथ ही अपने देश के हिसाब से इसमें बदलाव किया। अब इटली में इस सिस्टम का व्यापक पैमाने पर उपयोग हो रहा है। डॉ. जयंत ने बताया कि जिस तरह से उत्तराखंड में भूस्खलन एक बड़ी समस्या है, उसमें यह तकनीक काफी फायदेमंद साबित हो सकती है। यदि उत्तराखंड सरकार इसमें मदद मांगती है तो राज्य में तकनीक का योगदान कर वह खुद को गौरवान्वित महसूस करेंगे।  

विज्ञापन

10 सेकंड के भीतर प्रसारित किए गए 58 मैसेज  

देश में किए गए प्रयोगों के तहत चेतावनी संदेशों को मोबाइल नंबरों के लिए, छह बार 20 एसएमएस के एक सेट में प्रेषित किया गया। इसमें पाया गया कि 58 मैसेज 10 सेकंड के भीतर दिए गए। इसके 40 सेकेंड के बाद नई जानकारी प्रेषित की गई। वहीं, इटली में किए गए अध्ययन के दौरान 15 चेतावनी एसएमएस दस बार प्रसारित किए गए। इस दौरान पाया गया कि 102 मैसेज को 10 सेकंड के भीतर वितरित किया गया। अधिकतम 50 सेकंड की अवधि के बाद अन्य जानकारियां प्रेषित की गईं।  

बारिश की ताजा जानकारी के आधार पर जारी करता है एसएमएस  

किसी भी पहाड़ी क्षेत्र के लिए जियो वार्न सिस्टम कई घटकों के आधार पर संचालित होता है। डॉ. जयंत कुमार ने बताया कि इसके लिए संबंधित जगह पत्थर और मिट्टी की प्रकृति के अलावा पहाड़ के ढलान का आंकड़ा फीड किया जाता है। इसके बाद सेटेलाइट के जरिये बारिश की ताजा स्थिति के अनुसार, एसएमएस के जरिये मोबाइल पर चेतावनी जारी की जाती है।  
विज्ञापन

रियल टाइम में देता है चेतावनी  

सिस्टम की खासियत यह है कि इससे मौसम के पूर्वानुमान की तरह चेतावनी जारी नहीं होती बल्कि वर्तमान स्थिति के अनुसार मोबाइल कनेक्टिविटी के जरिये अपडेट जारी होता है। वैज्ञानिक के अनुसार, रियल टाइम के आसपास चेतावनी जारी होने से पहाड़ों की यात्रा कर रहे लोगों को जोखिम की जानकारी मिल जाती है।  

2012 में मिल चुका है बेस्ट थीसिस का अवार्ड  

इस तरह के जियो स्पेशियल डाटा के उपयोग, विश्लेषण के लिए ऑटोमेशन और डिसीजन सपोर्ट सिस्टम विकसित करने के लिए डॉ. जयंत घोष को हाल ही में इंडियन सोसायटी फॉर रिमोट सेंसिंग (आईएसआरएस) की ओर से लाइफ टाइम अचीवमेंट के लिए नेशनल जीयो स्पेशियल अवार्ड दिया गया है। इसके अलावा 2012 में इंडियन नेशनल एकेडमिक इंजीनियरिंग (आईएनएई) सोसायटी की ओर से बेस्ट थीसिस अवार्ड और आईआईएम अहमदाबाद ने 2013 में बेस्ट इनोवेशन थिसिस अवार्ड प्रदान किया है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें