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Dehradun News: आशारोड़ी मोहंड मार्ग ...मेरा दो सदी का सफर खत्म

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Iवाहनों के कोलाहल से दूर फिर शिवालिक के जंगलों से मिलने को हूं तैयारI

मैं आशारोड़ी मोहंड मार्ग ... मेरा दो सदी का सफर अब खत्म हो गया। मेरी यात्रा फिर से अपने उस स्वरूप में लौटने की रहेगी जहां से शुरुआत हुई थी। मैं फिर से शिवालिक के जंगलों से मिलने जा रहा हूं। वाहनों के शोर से इतर एकबार फिर मेरा आंगन हरा भरा होगा। मेरे साथी जो इस जंगल के असली रहबासी थे, स्वछंद मिल सकेंगे। यहां हिरन फिर कुलांचे भरेंगे। हाथी अपने परिवार के साथ फिर उसी स्वतंत्रता से चल सकेंगे। मेरे ऊपर से एक नया आधुनिक मार्ग शुरू होने जा रहा है जिसमें जंगल व जंगली जानवरों का ख्याल रखा गया है ताकि उन्हें वाहनों के शोर से परेशानी न हो और शांत वातावरण में स्वछंद विचरण कर सकें।

मैंने सभ्यताओं के विकास का हर वह दौर देखा जिसने मेरा समय-समय पर रंग रूप बदल दिया। हरे-भरे पेड़ों और कच्ची सड़क से शुरू हुए मेरे सफर में मुझे कई नाम मिले। बीते कई वर्षों से मुझे राष्ट्रीय राजमार्ग का दर्जा मिला हुआ है। एक जमाना था कि यहां से अंग्रेजों के घोड़े गुजरते थे। अब जो महज कुछ घंटों का सफर है वह कभी आधे दिन से भी ज्यादा का होता था। चौबीसों घंटे मैं लोगों को सफर कराता रहा लेकिन 60-70 साल पहले तक ऐसी स्थिति नहीं थी। रात होते ही यहां से सफर करना आसान नहीं था। समय के साथ आधुनिक चकाचाैंध ने मेरा दायरा बढ़ा दिया।
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दर्द होता था जब कोई हादसा होता था। मैं इतना बुरा तो नहीं कि किसी का साथ यूं ही छोड़ दूं मगर शायद भागदौड़ भरी जिंदगी और थोड़ा लालच ही इन हादसों की वजह रही होगी। धीरे-धीरे मेरी उपयोगिता खत्म होने लगी। अचानक छह साल पहले वाहनों के साथ ही बड़ी-बड़ी मशीनों का जमावड़ा लगने लगा जिसने वर्षों तक दर्द दिया लेकिन अब इन मशीनों से मेरा एक आधुनिक रूप बनकर तैयार हो गया। उम्मीद है कि अब मुझे आराम मिलेगा। साथ ही मैं दून वालों और यहां से गुजरने वाले हर व्यक्ति की यादों में तो रहूंगा। कोई उस नए रास्ते से खड़ा होकर मेरी तरफ इशारा कर ये तो कहेगा कि देखो यह वह मार्ग है जिस पर पहले जाते थे।
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