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थाना, अस्पतालों में बढ़ा मानवाधिकारों का हनन

Thu, 10 Dec 2015 12:54 PM IST
मनीष चंद्र भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड के मैदानी जिलों की थाना-चौकियों में मानवाधिकारों का सर्वाधिक हनन हो रहा है।
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जबकि पर्वतीय जनपदों की जनता बिजली, पानी और स्वास्थ्य सुविधाओं जैसे मानवाधिकारों से वंचित है। पहाड़ पर अस्पताल में डॉक्टरों की कमी से मानवाधिकार हनन की ज्यादा शिकायतें हैं। उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग की टीम ने करीब एक साल में रुड़की, रुद्रपुर से लेकर चमोली, चंपावत, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ समेत विभिन्न दूरस्थ क्षेत्रों का दौरा कर शिविर लगाए।

इस दौरान आयोग ने मानवाधिकारों के हनन संबंधी समस्याएं सुनीं। आयोग को पर्वतीय जिलों में स्वास्थ्य सुविधाओं का घोर अभाव, अस्पतालों में डॉक्टरों व पैरा मेडिकल स्टाफ की कमी की वजह से इलाज नहीं मिल पाने जैसी मानवाधिकारों के हनन से संबंधित शिकायतें सबसे अधिक मिलीं।
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इसके अलावा बिजली, पानी और सड़क मार्ग की समुचित व्यवस्था नहीं होने की भी शिकायतें हैं। बिजली या पानी की आपूर्ति एक बार बाधित हो जाए तो कई दिन तक विभाग वाले इसे ठीक करने नहीं पहुंचते हैं। सड़क मार्ग बाधित होने से रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजें पहुंचाना भी मुश्किल हो जाता है।

इसी तरह, मैदानी क्षेत्रों में पुलिस थाना-चौकियों में रिपोर्ट नहीं लिखने, दबंगों पर कार्रवाई करने से बचने जैसे मामलों से मानवाधिकारों का हनन बढ़ रहा है। मैदानी क्षेत्रों में भूमाफिया द्वारा संपत्ति कब्जाने, महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, दहेज प्रथा, बंधुआ मजूदरी, बाल श्रम, बच्चों के प्रति यौन हिंसा और पुलिस द्वारा विभिन्न मामलों में शिकायत न सुनने जैसी शिकायतें आई हैं।
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राज्य मानवाधिकार आयोग के चेयरमैन जस्टिस विजेंद्र जैन ने बताया कि आयोग के हस्तक्षेप से कई जगह स्थिति सुधरी भी है। अन्य कई विभागों को नोटिस भी भेजे गए हैं।

ऊधमसिंह नगर टॉप पर
मानवाधिकार आयोग के मुताबिक, मानवाधिकार हनन में ऊधमसिंह नगर टॉप पर है। उसके बाद क्रमश: देहरादून, हरिद्वार और नैनीताल जिले का नंबर आता है।

स्टाफ स्ट्रक्चर पर सरकार सुस्त
चेयरमैन विजेंद्र जैन ने बताया कि आयोग का स्टाफ स्ट्रक्चर पूर्णतया लागू न होने से आयोग का कामकाज प्रभावित होता है। सरकार इसे लेकर सुस्त दिखती है।
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