राज्यसभा सांसद व भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रमुख अनिल बलूनी के सोशल मीडिया पर चलाए गए ‘अपना वोट-अपने गांव’ अभियान को जबर्दस्त समर्थन मिल रहा है। सोमवार को प्रख्यात गीतकार प्रसून जोशी ने भी उनके अभियान के समर्थन में ट्वीट किया। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी बलूनी के अभियान की खुलकर तारीफ की। उन्होंने इसे भविष्य की अच्छी सोच करार दिया।
बलूनी ने पौड़ी जनपद के जिलाधिकारी को अपना नाम अपने पैतृक गांव की मतदाता सूची में दर्ज कराने के लिए पत्र लिखा था। इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर अपना वोट अपने गांव की मुहिम शुरू की। उनकी इस मुहिम का मुख्य ध्येय पहाड़ से घरबार छोड़कर राज्य के शहरों व राज्य से बाहर बस गए लोगों को उनके पैतृक गांवों से जोड़ना है। बलूनी का मानना है कि मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने से लोगों का अपने गांव और उससे जुड़ी संस्कृति, परंपरा से जुड़ाव होगा। साथ ही भविष्य में जनसंख्या के घटने से राजनीतिक असंतुलन की समस्या से बचा जा सकेगा।
सियासी जानकारों का भी मानना है कि पलायन के चलते आबादी घटने से परिसीमन के दौरान पहाड़ में विधानसभा की सीटें कम हो गईं। यदि पलायन की गति ऐसे ही बनी रहेगी तो अगले परिसीमन में पहाड़ का राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अधिक कम हो जाएगा। प्रदेश में सत्तारूढ़ होने के बाद से त्रिवेंद्र सरकार भी पलायन की समस्या का इलाज तलाश रही है। सरकार ने पलायन आयोग तक गठित किया है। इस बीच बलूनी ने भी निर्जन और गैर आबाद गांव को गोद लेकर रिवर्स पलायन की संभावनाओं को तलाशने की दिशा में कदम बढ़ाया और अब उन्होंने अपने गांव की मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराकर घर से दूर जा चुके अप्रवासी उत्तराखंडियों को संदेश देने की कोशिश की है।
सोशल मीडिया पर छेड़ी गई उनकी इस मुहिम को राजनीतिक दलों के नेताओं, सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों और युवाओं का जबर्दस्त समर्थन मिल रहा है। सोशल मीडिया पर सरकार के मंत्रियों, विधायकों ने भी अपने फेसबुक पर अपना वोट अपने गांव के लोगो को अपलोड किया है। कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक, अरविंद पांडेय, विधायक पुष्कर सिंह धामी, मुकेश कोली, महेश नेगी, गोपाल रावत, गणेश जोशी, पद्मश्री प्रीतम भरतवाण, हेमंत पांडेय, भाजपा नेता बलराज पासी समेत कई अन्य लोगों ने व्हाट्स एप और फेसबुक अपना वोट अपने गांव को प्रोफाइल बनाया है।
पलायन के हालात चिंताजनक, पांच लाख ने छोड़ा घरबार
ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग के सर्वेक्षण के मुताबिक, पिछले एक दशक में उत्तराखंड से पांच लाख से अधिक लोग घरबार छोड़ कर चले गए। इनमें एक लाख 18 हजार 981 लोग स्थायी रूप से पलायन कर चुके हैं। की पहली अंतरिम रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है। वर्ष 2011 की जनगणना के बाद प्रदेश में 734 राजस्व गांव गैर आबाद हो गए हैं, जिन्हें अब ‘घोस्ट विलेज’ पुकारा जा रहा है। 565 राजस्व गांव व तोक में वर्ष 2011 के बाद 50 फीसदी आबादी पलायन कर चुकी है, जिनमें छह गांव अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास है।