प्रशासनिक सेवा में अभी तक जहां रहा वहां मैंने हिंदी का नया शब्द सीखा। हर दिन हिंदी का एक नया शब्द सीखने की यह इच्छा आज भी पहले जितनी प्रबल है। यह कहना है उत्तराखंड कैडर के आईएएस अधिकारीे एस.ए. मुरुगेशन का। 2005 बैच के अफसर मुरुगेशन तमिलनाडु राज्य के मूल निवासी हैं। हिंदी भाषा से उनका कभी कोई वास्ता नहीं रहा। उन्होंने कभी हिंदी नहीं पढ़ी थी।
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आईएएस में चयन हुआ और लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी मसूरी में प्रशिक्षण लेने पहुंचे तो वहां पहली बार हिंदी का ककहरा सीखा। हिंदी वर्णमाला की किताब एक बार हाथों में आई तो तभी छूटी जब हिंदी के एक-एक शब्द का ज्ञान हो गया। मुरुगेशन कहते हैं, आज वे हिंदी में काफी सहज हैं।
उन्हें हिंदी में कोई कठिनाई नहीं होती। उनके मुताबिक हिंदी मातृभाषा है, इसे प्राथमिकता देनी ही चाहिए। मैंने चूंकि स्कूली जीवन से हिंदी नहीं पढ़ी थी, इसलिए आज भी मैं इस हिंदी का विद्यार्थी हूं। प्रशासनिक सेवा में मुझे जहां भी काम करने का अवसर मिला, मैंने हिंदी का एक नया शब्द सीखने का प्रयास किया। यह सीखने के बाद मुझे गौरव की अनुभूति होती है। मुरुगेशन शासन में प्रभारी सचिव पद पर तैनात हैं।
मैंने स्कूल में हिंदी पढ़ी है: सौजन्या
2003 बैच की आईएएस अधिकारी सौजन्या कर्नाटक राज्य से हैं। वह खुद को हिंदी में सहज पाती हैं। वह कहती हैं, स्कूल के समय हिंदी तीसरी भाषा थी। उन्होंने इस विषय को पढ़ा। प्रशासनिक सेवा में आने के बाद उन्हें हिंदी में कामकाज करने में बहुत ज्यादा परिश्रम नहीं करना पढ़ा। वह कहती हैं कि प्रशासनिक सेवा के दौरान क्षेत्रीय भाषा और बोली जन संवाद का एक प्रभावी और सशक्त माध्यम होती है। उसमें काम करने से आपके लिए जन समस्याओं को समझने में आसानी हो जाती हैं। सौजन्या वर्तमान में सचिव पद पर हैं।
इच्छा हो तो सहज है हिंदी: मनोज चंद्रन
भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारी मनोज चंद्रन केरल राज्य से हैं। वे उत्तराखंड राज्य में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। मनोज चंद्रन के लिए भी हिंदी कोई अनोखी भाषा नहीं है। वह कहते हैं कि केरल राज्य में बच्चे हिंदी विषय पढ़ते हैं। उन्होंने स्कूल के समय हिंदी पढ़ी। यह जरूर है कि हिंदी भाषी राज्यों के अफसरों की तरह वे हिंदी में उतने तेज नहीं हैं, लेकिन अभ्यास और निरंतर काम करने से उन्होंने हिंदी में काम करना सीख लिया है।