दशकों पहले हिमालयी दर्रों से गुजरने वाले परंपरागत मार्गों से भारत-तिब्बत और चीन के बीच व्यापार होता था। यही व्यापार पहाड़ों व सीमांत गांवों की अर्थव्यवस्था की धुरी होती थी। लेकिन परंपरागत मार्ग बंद होने से अब स्थानीय उत्पादों का व्यापार भी सिमट गया है।
यदि सरकार इन मार्गों को पुनर्जीवित या बहाल करने की पहल करे तो पहाड़ों पर उत्पादित पारंपरिक उत्पादों को एक बड़ा बाजार मिल सकता है। इससे पहाड़ों से पलायन रुकेगा और रोजगार के नए अवसर उपलब्ध होंगे।
भारत और तिब्बत के सीमावर्ती गांवों के लोग वस्तु विनिमय की पद्धति से अपनी जरूरत के सामान के लिए एक दूसरे के क्षेत्र में आते जाते थे। तिब्बती व्यापारी सोना, चांदी, मूंगा के गहने, घी, नमक, पशमीना ऊन, सुखाया हुआ चुल्लू, घोड़े, भेड़-बकरियां, याक व चौंर गाय लेकर भारत की ओर हर्षिल, बगोरी, नागणी तक आते थे। जबकि यहां से ग्रामीण बकरियों की पीठ पर लादकर मंडुआ, जौ का पिसा हुआ आटा, सत्तू, रामा सिराईं पुरोला का लाल चावल, गुड़, दालें समेत अन्य सामान तिब्बत ले जाते थे।
परंपरागत मार्गों से होने वाले इस व्यापार से दूरस्थ गांवों के लोगों की जरूरत पूरी होती थी और आमदनी का भी एक बड़ा साधन था। किसी जमाने में उत्तरकाशी क्षेत्र में भारत और तिब्बत के बीच 5830 मीटर की ऊंचाई वाले थागला-1 दर्रे से व्यापार होता था।
भारत की ओर से हर्षिल, मुखबा गांव से करीब पांच किमी ऊपर नागणी बाजार एवं सीमा पर मंडी तथा तिब्बत में सारंग कबरथ व्यापार की प्रमुख मंडियां थीं। तिब्बत से याक तथा भारत से बकरियों की पीठ पर सामान ढोकर सीमावर्ती क्षेत्र में बर्फबारी और बरसात के महीनों को छोड़कर साल के शेष सात महीने तक व्यापार चलता था। वर्तमान में यह व्यापार बंद है।
पारंपरिक मार्गों को खोलकर बढ़ेगा व्यापार व पर्यटन
इस व्यापार के सहभागी रहे बगोरी के नारायण सिंह नेगी तथा हर्षिल के डा.नागेंद्र सिंह रावत कहते हैं कि वर्ष 1962 के चीन आक्रमण से पहले ही वर्ष 1960 में यह व्यापार बंद हो गया था। अब सड़कें दूरस्थ गांवों तक पहुंचने से बाजार भी इन गांवों तक पहुंच चुका है। साथ ही स्थानीय उत्पाद भी जरूरत भर ही हो पा रहे हैं।
ऐसे में उच्च हिमालयी दर्रों के रास्ते व्यापार की तो ज्यादा संभावनाएं नहीं हैं, लेकिन पर्यटन के लिहाज से यह मार्ग काफी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। भारत-तिब्बत की सीमा पर शीत मरुस्थल वाला यह क्षेत्र गंगोत्री नेशनल पार्क के अंतर्गत आता है। पार्क क्षेत्र में खंडहर हुए नेलांग और जाढ़ूंग गांव के साथ ही हर्षिल बगोरी क्षेत्र को पर्यटन योजना से जोड़कर फायदा पहुंचाया जा सकता है। इससे पलायन भी रुकेगा और रोजगार के नए अवसर उपलब्ध होंगे।
चीनी भेड़ और बकरियां रहती थीं पहली पंसद
लिपुलेख दर्रे से होने वाला भारत-चीन व्यापार धीरे-धीरे सिमटने लगा है। इसका मुख्य कारण पशुओं के व्यापार पर प्रतिबंध है। भारत-चीन के व्यापार का आधार पशुओं का कारोबार रहा है। भारतीय व्यापारी चीन की मंडी से ऊन और बड़ी तादाद में पशुओं का आयात करते रहे हैं। इनमें भेड़, घोड़े और यॉक की संख्या सर्वाधिक रहती थी।
वर्ष 2010 में वैश्विकीकरण के नए नियमों के तहत दो देशों के बीच सीमा पर पशुओं के आयात निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके उल्लंघन को अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों का उल्लंघन माना जाता है। दो देशों के बीच आयात निर्यात के लिए सीमा पर क्वारंटाइन सेंटर (पशु जांच केंद्र) अनिवार्य है। इस क्वारंटाइन सेंटर में पशुओं को 15 दिन तक रखकर जांच की जाती है। ताकि कोई संक्रमित जानवर देश में न आ सके।
मेरा मानना है कि बंद पड़े पारंपरिक व्यापार मार्गों को बहाल करने की जरूरत है। इससे प्रदेश में स्थानीय उत्पादों का व्यापार बढ़ेगा और इससे पलायन रुकेगा। व्यापार से युवाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे। किसी जमाने में परंपरागत मार्गों से सारा व्यापार होता था। -पंकज गुप्ता, अध्यक्ष, इंडस्ट्री एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड
सीमावर्ती क्षेत्रों के परंपरागत व्यापार मार्गों को बहाल करने के लिए सरकार को पहल करनी चाहिए। इन मार्गों से पहाड़ों के पारंपरिक उत्पादों के व्यापार को बढ़ावा मिल सकता है। वहीं, पशुओं के आयात पर लगी रोक भी हटाने की जरूरत है।
-दीवान सिंह गर्ब्याल, व्यापारी
पहले दो दर्रों से होता था व्यापार
वर्ष 1962 से पहले भारत और चीन के बीच तकलाकोट के साथ ही ज्ञानिमा मंडी में भी व्यापार होता था। मुख्य रूप से धारचूला के खिमलिंग गांव के व्यापारी कारोबार के लिए ज्ञानिमा मंडी जाते थे। बाद में लिपुलेख दर्रे से कैलाश यात्रा के साथ व्यापार शुरू हुआ था। लेकिन ज्ञानिमा मंडी तक पहुंचने वाला रूट बंद हो गया। परंपरागत रूट बंद होने से व्यापार में काफी कमी आई है।