फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

उत्तराखंड: पहाड़ में पत्थर भी हिलेगा तो वैज्ञानिकों को चल सकेगा पता, इंटरफेरोमीटर तकनीकी हो सकती है बेहद कारगर

Thu, 03 Sep 2026 12:04 PM IST
Renu Saklani हैदराबाद से आफताब अजमत।

सार

पहाड़ में पत्थर भी हिलेगा तो वैज्ञानिकों को पता चल सकेगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि  हिमालयी राज्यों के लिए इंटरफेरोमीटर तकनीकी बेहद कारगर हो सकती है।

विज्ञापन
उत्तराखंड - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्यों में आने वाले समय में भू-स्खलन के चलते पत्थर भी हिलेगा तो वैज्ञानिकों को पता चल सकेगा। सुनामी चेतावनी प्रणाली में नाम स्थापित कर चुका हैदराबाद स्थित भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (इन्कोइस) भी इसमें आईआईआरएस, वाडिया इंस्टीट्यूट व संबंधित संस्थानों के साथ मिलकर काम करेगा।

इन्कोइस के वैज्ञानिक डाॅ. एन. श्रीनिवास राव ने बताया कि भविष्य में इंटरफेरोमीटर तकनीकी से ये काम आसान होने वाला है। इसके लिए इसरो लगातार सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेज रहा है। उन्होंने बताया कि हमारे देश में अमेरिका, चीन के मुकाबले अलग तरह की मुश्किल मौसम संबंधी चुनौतियां हैं।

विज्ञापन


उन देशों में आसानी से डॉप्लर रडार से बादलों के बरसने का अंदाजा लगाया जा सकता है लेकिन हमारे देश में पल-पल मिजाज बदलता है। डॉ. राव ने बताया कि हमारे पास तकनीकी है, बस ज्यादा से ज्यादा सैटेलाइट की जरूरत है। पहाड़ के लिए डॉप्लर रडार जितनी ज्यादा संख्या में लगेंगे, उतना ही मौसम को समझना आसान होगा।
 

विज्ञापन

क्या होती है इंटर फैरोमीटर तकनीक

इंटरफेरोमीटर तकनीक अत्यंत सटीक और उन्नत मापन तकनीक है, जो तरंगों (आमतौर पर प्रकाश, लेजर या रेडियो तरंगों) के व्यतिकरण के सिद्धांत पर काम करती है। इसका उपयोग विज्ञान और उद्योगों में ऐसी सूक्ष्म चीजों को मापने के लिए किया जाता है, जिन्हें किसी अन्य सामान्य तरीके से मापना नामुमकिन होता है। यह दुनिया की सबसे सटीक दूरी और सतह मापने वाली प्रणालियों में से एक है।

सुनामी से चिंतामुक्त देश बना भारत

भारत ने सुनामी जैसी आपदाओं से सीख लेकर ऐसा फ्रेमवर्क तैयार किया है, जिससे देश अब सुनामी से चिंता मुक्त बन चुका है। आस-पड़ोस के करीब 24 देशों को भी हम सुनामी से अलर्ट कर रहे हैं। भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र इस दिशा में काफी आगे बढ़ चुका है। भूकंप और उससे उठने वाली हर लहर पर वैज्ञानिक 24 घंटे नजर रख रहे हैं। इसके अलावा मछुवारों के लिए अनुकूल परिस्थितियों की पूरी जानकारी एसएमएस, ई-मेल के माध्यम से दी जा रही है, जिससे करीब 10 लाख मछुवारों का काम आसान हो गया है।

ये भी पढे़ं...उत्तराखंड:  तीन मृतक श्रमिकों के नाम से आर्थिक सहायता लेने का प्रयास, प्राथमिकी दर्ज, हरिद्वार जिले का है मामला

इसमें सैटेलाइट, ग्लेडियर भी बेहद अहम हैं, जो समुद्र की हर हरकत को पल-पल कैद करके वैज्ञानिकों तक भेज रहे हैं। वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार ने बताया कि देश में सुनामी से दो घंटे पहले आसानी से पता चल जाता है। इसके खतरों के हिसाब से संबंधित जिलों को अलर्ट भेजा जाता है। वहीं, मछुआरों के लिए टूना और हिल्सा मछली की एडवाइजरी भी जारी की जाती है।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें