मीडिया से बात करते हुए मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र ने कहा कि कार्यक्रम में मुख्यतः आपदा, जल शक्ति, पर्यावरणीय सेवाओं आदि पर चर्चा की गई। सभी हिमालय राज्यों द्वारा एक कॉमन एजेंडा तैयार कर केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को दिया गया।
हिमालयी राज्यों द्वारा यह भी मांग की गई है कि पर्यावरणीय सेवाओं के लिए ग्रीन बोनस दिया जाना चाहिए। हिमालयी राज्य देश के जल स्तम्भ हैं, जो माननीय प्रधानमंत्री जी के जल शक्ति संचय मिशन में प्रभावी योगदान देंगे।
नदियों के संरक्षण व पुनर्जीवीकरण के लिए केन्द्र पोषित योजनाओं में हिमालयी राज्यों को वित्तीय सहयोग दिया जाना चाहिए। नये पर्यटक स्थलों को विकसित करने में केन्द्र सरकार द्वारा सहयोग दिया जाना चाहिए।
देश की सुरक्षा को देखते हुए पलायन रोकने के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हिमालयी राज्यों की इस चिंता पर केन्द्रीय वित्त मंत्री द्वारा भी आाश्वासन दिया गया है। हिमालयन कॉन्क्लेव में इस बात पर सर्वसम्मति बनी कि प्रतिवर्ष इसका आयोजन किया जाएगा।
साथ ही हिमालय क्षेत्र के लिए अलग मंत्रालय का गठन किया जाए। इस सम्मेलन में नीति आयोग, 15वें वित्त आयोग व वित्त मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा हिमालयी राज्यों के लिए बजट में अलग से प्लान किये जाने का आश्वासन दिया गया।
हिमालयी राज्यों के पहले कान्क्लेव में शामिल राज्यों ने सतत विकास और समस्याओं के त्वरित समाधान के लिए सभी पर्वतीय राज्यों के लिए अलग से पर्वतीय विकास मंत्रालय बनाने की मांग की। करीब छह घंटे के मंथन के बाद राज्यों में ग्रीन बोनस से लेकर सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास, मजबूत आपदा प्रबंधन तंत्र सहित आठ मुद्दों पर सहमति बनी।
कान्क्लेव में ये रहे शामिल
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के अलावा कान्क्लेव में हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर, मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड कांगकल संगमा, नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो, अरुणाचल के उप मुख्यमंत्री चोवना मेन, मिजोरम के मंत्री टीजे लालनुनल्लुंगा, सिक्क्मि के डॉ.महेंद्र पी लामा, जम्मू कश्मीर के राज्यपाल के सलाहकार केके शर्मा, केंद्रीय वित्त आयोग के अध्यक्ष एनके सिंह, नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार, केंद्रीय पेयजल सचिव परमेश्वरम अय्यर आदि शामिल हुए। उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने सभी का आभार व्यक्त किया। कान्क्लेव में आपदा प्रबंधन और जल संरक्षण पर पीपीटी प्रस्तुतिकरण भी दिया गया।
- हिमालयी राज्य केंद्र के जल शक्ति संचय मिशन में प्रभावी योगदान देंगे।
- नदियों के संरक्षण-पुनर्जीवन को केंद्र पोषित योजनाओं में ज्यादा बजट मिले।
- नए पर्यटक स्थल विकसित करने को केंद्र से आर्थिक सहायता मिले।
- पर्यावरणीय सेवा के लिए हिमालयी राज्यों को ग्रीन बोनस दिया जाए।
- हिमालयी राज्यों का कान्क्लेव अब हर साल आयोजित किया जाएगा।
- पर्वतीय क्षेत्रों की विशेष परिस्थितियों के मद्देनजर अलग से योजनाएं बनें।
- आपदा प्रबंधन के लिए मौजूदा तंत्र को और मजबूत किया जाए।
मसूरी संकल्प के जरिए पर्वतीय राज्यों ने यह जाहिर कर दिया कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कायम करते हुए विकास के लिए आगे बढ़ना उनकी चिंता में शामिल हैं। मांग आधारित राज्य होते हुए भी हिमालयी राज्यों ने इस संकल्प में पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास को महत्व दिया। भारी भरकम योजनाओं की मांग की जगह मानव विकास को केंद्र में रखा।
उत्तराखंड सरकार की ओर से हाल ही में जारी की गई मानव विकास रिपोर्ट से साफ जाहिर है कि प्रदेश की तेज विकास दर का फायदा सभी हिस्सों को समान रूप से नहीं मिल पा रहा है। वन संपदा से जुड़ी रिपोर्ट बताती है कि राज्य 14 लाख करोड़ की वन संपदा को सहेजने के बाद भी इसका पूरा उपयोग नहीं कर पा रहा है। पहली रिपोर्ट पर्वतीय क्षेत्रों में विकास के लिए अधिक बजट की जरूरत को सामने रखती है तो दूसरी रिपोर्ट पर्यावरण संरक्षण की एवज में ग्रीन बोनस का आधार तैयार करती है।
यही हाल अन्य राज्यों का भी है। इसके बावजूद मसूरी संकल्प में राज्यों ने हिमालय की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने का संकल्प लिया। संकल्प पत्र में नदियों, ग्लेश्यिरों, वन संपदा, जैव विविधता के संरक्षण का प्रण लिया है। राज्यों ने सतत विकास पर काम करने का संकल्प लिया। यही राज्यों की दुखती रग भी है। सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल करने में उन्हें अधिक संसाधनों की जरूरत है लेकिन यह संसाधन उपलब्ध नहीं हो रहे हैं। संकल्प पत्र में हिमालय की लोक परंपराओं को संरक्षित करने की शपथ भी ली है।