मसूरी में हिमालयी राज्यों का सम्मेलन तो निबट गया, लेकिन सियासी दलों के पीठ थपथपाने और मखौल उड़ाने की शुरुआत भी हो गई है। भाजपा इस पूरी कवायद की सराहना करते हुए आगे आई है। राज्य सरकार के प्रयासों के साथ केंद्र सरकार की मंशा को जोड़ते हुए भाजपा के नेताओं ने सम्मेलन को बेहद सफल बताया है।
दूसरी तरफ, कांग्रेस के नेता हैं, जिन्हें हिमालयी सम्मेलन आकर्षित नहीं कर पाया है। उन्होंने सम्मेलन को लेकर मीन मेख निकालने शुरू कर दिए हैं। रविवार को भाजपा की तरफ से जब प्रदेश प्रभारी श्याम जाजू ने प्रतिक्रिया दी थी, तो प्रतिध्वनि में वाह जैसी बात सुनाई दी। दूसरी तस्वीर, पूर्व सीएम हरीश रावत से जुड़ी रही, जो कि हिमालयी सम्मेलन को लेकर सोशल मीडिया पर लगातार कुछ न कुछ प्रतिक्रिया दे रहे थे। सम्मेलन के समापन के बाद वह निराशा जताते हुए नजर आए।
भाजपा ने अपने घोषणापत्र में वादा किया था कि वह हिमालयी राज्यों के हितों की खास चिंता करेगी। इन राज्यों के विकास के लिए जो जरूरी होगा, वह किया जाएगा। केंद्र सरकार इसी दिशा में लगातार काम कर रही है। मसूरी में हिमालयी राज्यों का सम्मेलन इस कड़ी में किया गया महत्वपूर्ण प्रयास है, जो पूरी तरह से सफल रहा है। इस सम्मेलन में हुए विमर्श और बनी सहमति के दूरगामी नतीजे सामने आएंगे। हिमालयी राज्यों के विकास का एक नया रास्ता इस सम्मेलन से खुलेगा।
-श्याम जाजू, प्रदेश प्रभारी, उत्तराखंड भाजपा
मसूरी कॉनक्लेव से आशा के बजाय निराशा अधिक हुई। पहले तो 11 मुख्यमंत्रियों की जगह सिर्फ चार राज्यों के मुख्यमंत्री आए। नीति आयोग के जिस सज्जन ने प्रतिनिधित्व किया, वो तो भारतीय जनता पार्टी का स्पोक्स पर्सन हैं, उनसे कुछ शाब्दिक सेवा के अलावा ठोस अपेक्षा नहीं की जा सकती। निर्मला सीतामरण जी ने सीमांत गांवों को आंख, नाक, कान बताकर बेहतर शब्दों का इस्तेमाल कर ग्रीन बोनस और सीमांत क्षेत्रों को विशेष प्रोत्साहन राशि देने के सवाल को छोड़ दिया।
-हरीश रावत, वरिष्ठ नेता कांग्रेस और पूर्व सीएम, उत्तराखंड