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Himalaya Crisis Series: साल दर साल डरा रही हिमालय में आने वाली अप्रत्याशित आपदाएं, दे रहीं गहरे जख्म

Mon, 05 Sep 2022 04:23 PM IST
रेनू सकलानी विनोद मुसान, अमर उजाला, देहरादून

सार

उच्च हिमालय क्षेत्र में आई अप्रत्याशित बाढ़ ने केदारनाथ समेत राज्य के पर्वतीय जिलों में जो तांडव मचाया था, उसे याद करते हुए आज भी आत्मा कांप जाती है। इस जलप्रलय में आधिकारिक रूप से चार हजार से अधिक लोगों की जान गई।
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हिमालय - फोटो : Pixabay
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विस्तार
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जलवायु परिवर्तन का असर हिमालय के मिजाज को बिगाड़ रहा है। साल दर साल आने वाली अप्रत्याशित आपदाएं डरा रही हैं। बीते कुछ सालों की घटनाओं पर नजर डालें तो पता चलता है कि कैसे बेमौसम की बारिश, बाढ़ और भूस्खलन के कारण हिमालयी क्षेत्र को बड़ी त्रासदी से गुजरना पड़ा है।

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बीते कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण सर्दियों में गर्मी, गर्मियों में तेज बारिश और मानसून बीतने के बाद आई आपदा ने राज्य के लाखों लोगों को प्रभावित किया। सैंकड़ों गांव विस्थापन की मांग कर रहे हैं। बेमौसमी बारिश और आपदा से राज्य को करोड़ों का नुकसान हुआ है। बागवान से लेकर किसान तक इससे प्रभावित हुए हैं। 

वर्ष 2013 में 16 और 17 जून को आई आपदा ने केदारनाथ घाटी को पूरी तरह बर्बाद कर दिया था। उच्च हिमालय क्षेत्र में आई अप्रत्याशित बाढ़ ने केदारनाथ समेत राज्य के पर्वतीय जिलों में जो तांडव मचाया था, उसे याद करते हुए आज भी आत्मा कांप जाती है। इस जलप्रलय में आधिकारिक रूप से चार हजार से अधिक लोगों की जान गई। केदारनाथ धाम और इसके आसपास के इलाकों में इस कदर तबाही आई थी कि इससे उबरने में समय तो लगा ही, साथ ही पुनर्निर्माण में करीब 2700 करोड़ रुपये भी खर्च हो गए।

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केदारनाथ आपदा एक नजर में ...
- केदारनाथ आपदा में 4400 से अधिक लोग मारे गए या लापता हो गए।
- 4200 से अधिक गांवों का पूरी तरह से संपर्क टूट गया।
- 2141 भवन पूरी तरह से नष्ट हो गए।
- जलप्रलय में 1309 हेक्टेयर कृषि भूमि बह गई ।
- सेना व अर्द्ध सैनिक बलों ने 90 हजार लोगों को रेस्क्यू किया।
- 30 हजार लोग पुलिस ने बचाए।
- 55 नरकंकाल सर्च ऑपरेशन में खोजे गए।
- 991 स्थानीय लोग अलग-अलग जगहों पर मारे गए।
-11,000  से अधिक मवेशी बह गए या मलबे में दब गए।
- 1,309 हेक्टेयर भूमि बाढ़ में बह गई।
- 2,141 भवनों का नामों-निशान मिट गया।
- 100 से ज्यादा बड़े व छोटे होटल ध्वस्त हो गए।
-  90 हजार यात्रियों को यात्रा मार्गों से सेना ने  निकाला।
-  30 हजार स्थानीय लोगों को पुलिस ने सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया।
-  09 राष्ट्रीय व 35 स्टेट हाईवे क्षतिग्रस्त हो गए।
-  2385 सड़कों को भारी नुकसान पहुंचा।
-  86 मोटर पुल और 172 बड़े व छोटे पुल बह गए।
 

इतिहास में दर्ज हो गई वर्ष 2021 की रैणी आपदा 
- वर्ष 2021 में फरवरी माह में रैणी आपदा भी एक अप्रत्याशित घटना थी। जल प्रलय में 206 लापता हो गए थे, इनमें से अब तक 176 के शव बरामद हो चुके हैं। जबकि 50 से अधिक लोग लापता हैं। 
- इस आपदा से 520 मेगावाट की तपोवन विष्णुगाड़ जल विद्युत परियोजना पूरी तरह से ध्वस्त हो गई थी। 
- चमोली आपदा के बाद तमाम विज्ञानियों ने यह भी बताया कि ऋषिगंगा कैचमेंट से निकली जलप्रलय महज एक घटना नहीं, बल्कि इसमें कई घटनाक्रम शामिल थीं।
- वाडिया संस्थान के अध्ययन के मुताबिक, करीब 5600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित रौंथी पर्वत से जब हिमखंड टूटा तो नीचे रौंथी गदेरे (ऊंचाई समुद्र तल से 3800 मीटर) तक पहुंचते हुए मलबे का वेग 55 मीटर प्रति सेकेंड था।
- इसके बाद प्राकृतिक आपदाओं के लिए सर्वाधिक संवेदनशील उत्तराखंड राज्य में एक राज्य आपदा प्रबंधन संस्थान खोले जाने की सिफारिश की गई थी। 
- इसके अलावा बीते दिनों कैबिनेट ने राज्य में उत्तराखंड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र (यूएलएमएमसी) खोले जाने का प्रस्ताव पास किया है। 
- रैंणी आपदा के बाद एनडीएम ने भारतीय मौसम विभाग, वाडिया इंस्टीटयूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी व जशक्ति व खान मंत्रालय के साथ मिलकर एक अध्ययन कराया था। रिपोर्ट में हिमालय क्षेत्र में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के लिए अध्ययन करने की सलाह दी गई है। ऊर्जा मंत्रालय से कहा गया है कि हिमालय में बहुत सी जल विद्युत परियोजनाएं पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील हैं।
- रैंणी आपदा की वजह ग्लेशियरों के टूटने की मानी गई। अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया कि नदियों के उद्गम स्थलों व ग्लेशियर क्षेत्रों  में उपग्रहों (सेटेलाइट) से निगरानी को बढ़ाया जाए। इसके लिए इसरो देश से बाहर दूसरी एजेंसियों का भी सहयोग ले सकता है। साथ ही ऊंचाई वाले स्थानों पर हाइड्रो मेट्रोलॉजिकल स्टेशन भी बनाए जाएं।
- रिपोर्ट में ग्लेशियरों के अध्ययन के लिए सेंटर फॉर ग्लेशियल रिसर्च स्टडीज एंड मैनेजमेंट की स्थापना की जरूरत बताई गई। साथ ही कहा गया कि ग्लेशियोलॉजी व ग्लेशियर अध्ययन करने वाले अकादमिक व शोध संस्थान अलग-अलग होकर काम करने के बजाय एक दूसरे को आंकड़ों और अध्ययन को साझा करें और इसके दोहराव से बचें।

जनवरी माह में जंगलों मेें लगी आग ने सबको चौंकाया 
- बीते वर्ष जनवरी के महीने में उत्तराखंड के जंगलों में जगह-जगह आग लगने की घटनाएं सामने आईं। एक अक्तूबर 2020 से चार जनवरी 2021 तक राज्य के जंगलों में आग की 236 घटनाएं हुईं। इसकी वजह अक्तूबर से दिसंबर 2020 तक सामान्य बारिश में 71 प्रतिशत कमी बताई गई। 

मई माह में बादल फटने की अप्रत्याशित घटना 
- बीते वर्ष मई महीने की शुरुआत ही राज्य में एक के बाद एक बादल फटने की घटनाओं से हुई। तकरीबन 24 से अधिक बादल फटने की घटनाएं विभिन्न सूचना माध्यम के जरिए रिपोर्ट की गईं। 

दो दिन की बारिश ने बरपाया कहर 
बीते वर्ष 17 से 19 अक्तूबर के बीच हुई भारी बारिश ने 79 लोगों की जान ले ली। खासकर कुमाऊं के नैनीताल जिले में भारी कहर बरपाया था। मरने वाले लोगों में सर्वाधिक 29 लोग नैनीताल जिले के थे। इस आपदा में 13 ट्रैकर्स (सात उत्तरकाशी और छह बागेश्वर में) मारे गए थे। नैनीताल जिले तीन लोग और यूएसनगर में एक व्यक्ति आज भी लापता है। 

19 अगस्त को बादल फटने से देहरादून और टिहरी में भारी तबाही
इस वर्ष 19 अगस्त को हुई अति वृष्टि और बादल फटने की घटना से टिहरी और देहरादून जनपद में भारी कहर बरपाया। अतिवृष्टि के कारण दोनों जिलों में 11 लोगों की जान चली गई। 
- देहरादून के भैसवाड़, सरखेत, सौड़ा सरोली रायपुर में बादल फटने से सौंग नदी के ऊफान पर आने से दो पुलों की एप्रोच रोड बह गई। जबकि पांच लोग मारे गए, 11 घायल हुए और चार अब भी लापता हैं। जानमाल के साथ संपत्ति का भी भारी नुकसान हुआ। 

- देहरादून जिले से लगते टिहरी जिले के धनोल्टी तहसील के गांव ग्वाड़, सिल्ला और धनचुला में बादल फटने से पांच लोगों की मौत हो गई और तीन अब भी लापता हैं। 

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वर्ष 2021 में 
303 लोग मारे गए 
87 लोग घायल हुए 
61 लोग लापता हुए

वर्ष 2022 में अब तक
43 लोग मारे गए 
52 घायल हुए 
सात लोग लापता 

यह बात सही है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम के मिजाज में बदलाव देखने को मिल रहा है। इसके कारण जहां औसत तापमान में वृद्धि दर्ज की गई है, वहीं बारिश के चक्र पर भी इसका असर पड़ा है। नंबर ऑफ रेन डे में कमी आई है। कम समय में अधिक बारिश के मामलों में वृद्धि हुई है, जो आपदाओं को जन्म देती है। - बिक्रम सिंह, निदेशक मौसम विज्ञान विभाग, देहरादून

जलवायु परिवर्तन का असर हिमालय के ग्लेशियरों पर भी पड़ा है। गर्मियों के दिनों में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है, जबकि सर्दियों के दिन कम हो रहे हैं। जबकि ग्लेशियर क्षेत्र में अब बारिश भी हो रही है, जिससे यहां झील बन रही हैं। इससे ग्लेशियर के पिघलने की गति तेज हुई है। कई बार यह आपदा का सबक बन जाते हैं। - डॉ. बीपी डोभाल, वाडिया हिमलायन जिओलॉजी से सेवानिवृत्त वैज्ञानिक 
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