जनवरी माह में जंगलों मेें लगी आग ने सबको चौंकाया
- बीते वर्ष जनवरी के महीने में उत्तराखंड के जंगलों में जगह-जगह आग लगने की घटनाएं सामने आईं। एक अक्तूबर 2020 से चार जनवरी 2021 तक राज्य के जंगलों में आग की 236 घटनाएं हुईं। इसकी वजह अक्तूबर से दिसंबर 2020 तक सामान्य बारिश में 71 प्रतिशत कमी बताई गई।
मई माह में बादल फटने की अप्रत्याशित घटना
- बीते वर्ष मई महीने की शुरुआत ही राज्य में एक के बाद एक बादल फटने की घटनाओं से हुई। तकरीबन 24 से अधिक बादल फटने की घटनाएं विभिन्न सूचना माध्यम के जरिए रिपोर्ट की गईं।
दो दिन की बारिश ने बरपाया कहर
बीते वर्ष 17 से 19 अक्तूबर के बीच हुई भारी बारिश ने 79 लोगों की जान ले ली। खासकर कुमाऊं के नैनीताल जिले में भारी कहर बरपाया था। मरने वाले लोगों में सर्वाधिक 29 लोग नैनीताल जिले के थे। इस आपदा में 13 ट्रैकर्स (सात उत्तरकाशी और छह बागेश्वर में) मारे गए थे। नैनीताल जिले तीन लोग और यूएसनगर में एक व्यक्ति आज भी लापता है।
19 अगस्त को बादल फटने से देहरादून और टिहरी में भारी तबाही
इस वर्ष 19 अगस्त को हुई अति वृष्टि और बादल फटने की घटना से टिहरी और देहरादून जनपद में भारी कहर बरपाया। अतिवृष्टि के कारण दोनों जिलों में 11 लोगों की जान चली गई।
- देहरादून के भैसवाड़, सरखेत, सौड़ा सरोली रायपुर में बादल फटने से सौंग नदी के ऊफान पर आने से दो पुलों की एप्रोच रोड बह गई। जबकि पांच लोग मारे गए, 11 घायल हुए और चार अब भी लापता हैं। जानमाल के साथ संपत्ति का भी भारी नुकसान हुआ।
- देहरादून जिले से लगते टिहरी जिले के धनोल्टी तहसील के गांव ग्वाड़, सिल्ला और धनचुला में बादल फटने से पांच लोगों की मौत हो गई और तीन अब भी लापता हैं।
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वर्ष 2021 में
303 लोग मारे गए
87 लोग घायल हुए
61 लोग लापता हुए
वर्ष 2022 में अब तक
43 लोग मारे गए
52 घायल हुए
सात लोग लापता
यह बात सही है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम के मिजाज में बदलाव देखने को मिल रहा है। इसके कारण जहां औसत तापमान में वृद्धि दर्ज की गई है, वहीं बारिश के चक्र पर भी इसका असर पड़ा है। नंबर ऑफ रेन डे में कमी आई है। कम समय में अधिक बारिश के मामलों में वृद्धि हुई है, जो आपदाओं को जन्म देती है। - बिक्रम सिंह, निदेशक मौसम विज्ञान विभाग, देहरादून
जलवायु परिवर्तन का असर हिमालय के ग्लेशियरों पर भी पड़ा है। गर्मियों के दिनों में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है, जबकि सर्दियों के दिन कम हो रहे हैं। जबकि ग्लेशियर क्षेत्र में अब बारिश भी हो रही है, जिससे यहां झील बन रही हैं। इससे ग्लेशियर के पिघलने की गति तेज हुई है। कई बार यह आपदा का सबक बन जाते हैं। - डॉ. बीपी डोभाल, वाडिया हिमलायन जिओलॉजी से सेवानिवृत्त वैज्ञानिक