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उत्तराखंड में 'सोना' उगा रहे हिमाचल के बागवान

Sun, 19 Oct 2014 03:55 PM IST
सूरत सिंह रावत/ अमर उजाला, मोरी (उत्तरकाशी)
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हिमाचल के सेब उत्पादन क्षेत्र में विस्तार की गुंजाइश नहीं होने पर बड़ी संख्या में सेब काश्तकार उत्तराखंड के मोरी क्षेत्र का रुख कर रहे हैं।
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यहां सेब के बागीचे लगाकर समृद्धि की राह पर बढ़ रहे हिमाचल के किसान स्थानीय लोगों के साथ ही यहां सरकारी सिस्टम को भी आइना दिखा रहे हैं। इनमें से कई किसान तो सालाना 40 से 70 लाख तक कमाई कर रहे हैं।

पहले तिब्बत से वाया हिमाचल मोरी पहुंचे करमा प्रधान और उनके परिवार ने कोटगांव के बानकुड़ी में बागीचा तैयार कर सेब के सात हजार पेड़ पनपाए।

इस बार इनके बागीचे से सैंपल के रूप में ही 4500 पेटी सेब निकला, जिससे उन्हें चालीस लाख से अधिक की आय हुई। परिपक्व होने पर बागीचे से तीस हजार पेटी सेब निकलने की उम्मीद है।
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मुफलिसी में बेच दी अपनी जमीन

हिमाचल के ही राजेंद्र गांगटा ने कोटगांव में सेब का बागीचा लगाया और इस बार 46 लाख रुपए का सेब बेचा। इसी तरह बलबीर छासटा ने भी सेब से 70 लाख की आय की।

इसके उलट कभी कई हेक्टेयर जमीन के मालिक रहे बलिराम के पास अब महज चार नाली जमीन बची है। हाकम सिंह ने बाहरी छह परिवारों को अपनी अधिकांश जमीन बेच दी।

अब गुजारे लायक जमीन भी पास में न होने पर मजदूरी कर पेट पालने को मजबूर हाकम सिंह जर्जर हो चुके अपने पुश्तैनी मकान की मरम्मत भी नहीं करा पा रहे हैं।

भूमिहीन की श्रेणी में आया सैंजराम का परिवार भी जंगल में झोपड़ी बनाकर गुजर बसर कर रहा है। इस स्थिति के लिए काफी हद तक कृषि बागवानी से जुड़े सरकारी विभागों की नाकामी माना जा रहा है।

वरना जो जमीनें तकनीकी रूप से सक्षम बाहरी किसानों के लिए सोना उगल सकती हैं, वो स्थानीय लोगों के लिए क्यों नहीं?
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अवसाद ग्रस्त हुए स्थानीय किसान

वर्ष 1981 में कोट गांव में कुल 69 स्थानीय परिवार गांव की 105 हेक्टेयर कृषि भूमि पर अपनी जरूरत का गेहूं, धान, राजमा, रामदाना, आलू की खेती कर गुजर बसर करते थे।

आज स्थानीय परिवारों की संख्या 112 है, जबकि यहां बाहरी राज्य एवं जनपदों से आए परिवारों की संख्या 114 है। गांव की 70 हेक्टेयर जमीन पर इन्हीं बाहरी लोगों के सेब बागान लहलहा रहे हैं।

इन हालात के चलते पूर्व में अपनी बेशकीमती जमीन तीन से आठ सौ रुपए नाली की दर से बेचकर भूमिहीन की श्रेणी में पहुंचे कई स्थानीय काश्तकार अवसाद ग्रस्त होकर नशे की गिरफ्त में हैं।

हिमाचल का कृषि बागवानी मॉडल उत्तराखंड के लिए बेहतर है। हमें जमीन बेचकर अफसोस करने के बजाय हिमाचल के लोगों से बागवानी की सीख लेनी चाहिए। हमारी सरकार को भी चाहिए कि वह दूरस्थ इलाकों में ग्रामीणों को कृषि बागवानी के लिए प्रोत्साहित करे।
- जगमोहन सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता मोरी
 
केवल कोट गांव ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड के कई गांवों की यही स्थिति है। हम जितने अपनी जमीन से दूर भागेंगे, तो अपने ही घर में बेगाने हो जाएंगे। स्थानीय लोगों को कृषि एवं बागवानों के लिए प्रेरित करने को जमीन का नियोजन और सरकारी योजनाओं का दूरस्थ गांवों तक पहुंचना जरूरी है।
- महेंद्र कुंवर, सचिव, हार्क
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