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कहीं आपके घर का चिराग भी न छीन ले हाई बीम लाइट, सामने आए दुर्घटनाओं के चौंकाने वाले आंकड़ें

Sun, 23 Sep 2018 09:11 AM IST
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, रुड़की
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high beam light
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हाईवे पर दौड़ रहीं कारों, बसों और ट्रकों की हाई बीम लाइटों से कई घरों के चिराग बुझ चुके हैं। वाहनों में लगी चकाचौंध लाइटों से अधिकांश वाहन चालक असमय काल के मुंह के समा चुके हैं, लेकिन इन वाहनों की हाई बीम को काली करने और क्षमता से अधिक लाइटें लगाने पर पुलिस और परिवहन विभाग कार्रवाई नहीं कर रहा है। इससे दुर्घटनाओं का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है।

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हाईवे और शहर की सड़कों पर चलने वाली कार, बस और ट्रक के अधिकतर चालक अपने वाहनों को हाई बीम लाइट पर ही चलाते हैं। हाई बीम लाइटों के कारण सामने से आ रहे दोपहिया समेत अन्य छोटे वाहनों के चालक की आंखें चौंधिया जाती हैं।

इससे कई बार वाहन चालक अपना नियंत्रण खो बैठता है और दुर्घटना का शिकार हो जाता है। हाई बीम पर चलने वाले वाहनों और एलईडी लाइट लगी कारों के कारण सर्वाधिक दुर्घटनाएं हो रही हैं। इसके बावजूद पुलिस और परिवहन विभाग इन वाहनों के खिलाफ कभी कार्रवाई नहीं करता।
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काली होती थी वाहनों की हेडलाइट       

मोटर वेहिकल एक्ट के अनुसार, किसी भी वाहन की हेडलाइट को एक चौथाई काला किया जाना है। 90 के दशक में अधिकांश बसों, कारों और ट्रकों की हेडलाइट काली रहती थी, लेकिन पुलिस और परिवहन विभाग की सख्ती न होने से कारों, बसों और ट्रकों की हेडलाइट काली नहीं की जाती, जिससे प्रदेश में सड़क दुर्घटनाओं का ग्राफ बढ़ता जा रहा है। 

रोडवेज बसों की हेडलाइन भी काली नहीं 
रोडवेज बसों की हेडलाइट भी एक चौथाई काली नहीं की जाती, जिससे वाहन सवार नियंत्रण खोकर दुर्घटना का शिकार हो जाता है। रोडवेज मुख्यालय की ओर से भी इन वाहनों की हेडलाइट काली करने के लिए आदेशित नहीं किया जाता।        

सड़क दुर्घटना के आंकड़े (पुलिस से प्राप्त आंकड़े)       
रुड़की सर्किल       
2015- 74       
2016- 81       
2017- 78       
 

क्या कहते हैं नेत्र विशेषज्ञ

मंगलौर सर्किल       
2015- 105       
2016- 113       
2017- 105       

लक्सर सर्किल       
2015- 25       
2016- 56       
2017- 48       

क्या कहते हैं नेत्र विशेषज्ञ
कार, बस और ट्रकों की हाई बीम और एलईडी लाइट दुर्घटना का कारण बनती है। वाहनों को बिना डिवाइडर वाले स्थान पर लो बीम चलाना चाहिए। 45 साल से अधिक आयु के व्यक्ति की आंखों में मोतिया बनना शुरू हो जाता है। ऐसे में चकाचौंध लाइट के कारण वह अपने वाहन से नियंत्रण खो देता है और दुर्घटना का शिकार हो जाता है।

-डॉ.महेश खेतान, नेत्र रोग विशेषज्ञ, सिविल अस्पताल       

   
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मोडिफाई बुलेट की तेज आवाज बढ़ा रही परेशानी 

नई बुलेट खरीदकर उसकी शक्ल सूरत बदलने के ट्रेंड से जहां सर्विस सेंटर संचालकों की चांदी बन रही है तो वहीं मोडिफाई बुलेट की कानफाड़ूू आवाज लोगों के लिए परेशानी का सबब बन रही है। यही नहीं इसकी वजह से गली और मोहल्लों में आए दिन झगड़े भी हो रहे हैं। स्थिति यह है कि शहर और देहात की गलियां और सड़कें इन बुलेट की आवाज दहल रही हैं। आंकड़ों के मुताबिक, सीपीयू ने छह माह में 95 और सिविल लाइंस कोतवाली पुलिस ने 30 बुलेट के साइलेंसर और हॉर्न जब्त कर उनका चालान कर चुकी है।

नई बुलेट खरीदकर एआरटीओ कार्यालय में पंजीकरण कराने से पूर्व युवा सर्विस सेंटर पहुंचकर इसे मोडिफाई करवाते हैं। सबसे पहला उनका साइलेंसर बदलवाया जा रहा है। हार्न भी बड़े बडे़ लगाए जा रहे हैं। साइलेंसर को इस हिसाब से फिट किया जाता है कि एक्सीलेटर में प्रेशर बनाने पर गोली की तरह आवाज निकलती है। इस आवाज के कारण खासकर बच्चों और बुजुर्गों को ज्यादा परेशानी होती है।

बताया जा रहा है कि मोहल्ले और कॉलोनियों में बुलेट के शोर के कारण झगड़े तक हो रहे हैं। कई लोग थाने में शिकायत तक कर चुके हैं। इसके बावजूद पुलिस, एआरटीओ और जिला प्रशासन शांति भंग करने वाली इन बुलेट पर लगाम नहीं कस का पा रहे हैं। कार्रवाई के नाम पर कभी कभार ऐसी बुलेट के खिलाफ कार्रवाई कर प्रेशर हॉर्न और साइलेंसर जब्त किया जाता है।
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