सांप्रदायिक सद्भाव, जाति एवं वर्ग संघर्ष की उन्हें सूक्ष्म परख थी। देश के हित में इन सभी के बीच सामंजस्य कैसे बनाए रखें, इस विषय पर उनकी प्रभावशाली एवं स्पष्ट सोच थी। यह कहना है स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा के निकटस्थ सहयोगी योगेंद्र खंडूड़ी का। उन्होंने कहा कि मैं कह सकता हूं कि वे ऐसे डॉक्टर थे जिनके पास हर रोग का इलाज था। उनके जीवन पर गांधी, सुभाष और नेहरू के व्यक्तित्व व विचारधारा का गहरा प्रभाव था।
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ प्रयागराज तत्कालीन इलाहाबाद में छात्र एवं युवाओं को लेकर बहुत बड़ा आंदोलन किया। इस आंदोलन में छात्र एवं युवा खुलकर अंग्रेजों के खिलाफ सड़कों पर उतर आए। ब्रिटिश सरकार ने उन पर पांच हजार रुपये का इनाम घोषित कर रखा था। उनके गिरफ्तार होने पर उन्हें कई साल दिल्ली व उत्तर प्रदेश के जेलों में रखा गया।
स्वतंत्रता के बाद देश के पहले चुनाव 1952 में वे उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। इसके बाद भारतीय राजनीति में वे एक चमकते हुए सितारे की भांति उभरे। उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र के समग्र विकास के लिए उन्होंने पर्वतीय विकास मंत्रालय बनाया। पर्वतीय क्षेत्रों में कार्यरत सारे विभाग इस मंत्रालय के अधीन कर दिए।
उनकी सोच थी कि भौगोलिक दृष्टि से अलग पहाड़ के विकास के लिए एक ऐसा मंत्रालय होना चाहिए जो कम समय में ही समस्याओं को समझे और हल करने का प्रयास करे। इस मंत्रालय को बनाने के बाद पर्वतीय क्षेत्र के विकास में पहले की अपेक्षा तेजी आई। पर्वतीय विकास मंत्रालय ही उत्तराखंड राज्य निर्माण की दिशा में पहला कदम था। वे सही मायने में धर्म-निरपेक्ष नेता थे।
वे व्यक्तिगत जीवन में पक्के सनातनी हिंदू थे, लेकिन सार्वजनिक जीवन में वे सर्व-धर्म सद्भाव में विश्वास रखते थे। वे राजनीति में आने वाले युवाओं को समसामयिक घटनाओं एवं ज्ञान के क्षेत्र में नए विषय वस्तुओं के ज्ञानवर्धन के लिए हमेशा प्रेरित करते रहते थे।
अगर उन्हें ऐसा लगता था कि युवा ज्ञान की ओर अपेक्षित रूप से सतर्क और सचेत नहीं है तो उन्हें वे अपने अंदाज में डांटते भी थे। समृद्ध ज्ञान क्षमता, अटल व दृढ़ निश्चयी एवं मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण उनका विराट व्यक्तित्व आज भी हर किसी को नतमस्तक होने के विवश कर देता। इसलिए उन्हें हिमालय पुत्र कहा जाता है।