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...तो कैसे पैदा होंगे डॉक्टर?

Thu, 03 Oct 2013 01:04 PM IST
शेषमणि शुक्ल/अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड में डॉक्टर्स और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी के कारण स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह से बाधित हैं। लेकिन सरकारी तंत्र की ओर से कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। कई सालों से मेडिकल शिक्षा से जुड़ी योजनाएं परवान नहीं चढ़ पा रही है।
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राज्य में सरकारी डॉक्टर्स की कमी को देखते हुए श्रीनगर और हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज में सरकारी शुल्क में रियायत दी गई। बदले में एमबीबीएस करने के बाद संबंधित डॉक्टर्स को न्यूनतम पांच वर्ष तक प्रदेश में सेवाएं देने का बांड देना होता है।

यह व्यवस्था बाकी राजकीय मेडिकल कॉलेजों में भी बनाई जानी है। लेकिन मेडिकल कॉलेज के बाकी तीन प्रोजेक्ट अधर में हैं। यही स्थिति 13वें वित्त आयोग और केंद्र सरकार से मिले नर्सिंग कॉलेज-स्कूल तथा एएनएम-जीएनएम संस्थानों की है। कहीं जमीन मिली तो धन नहीं। कहीं धन मिला तो जमीन नहीं। जबकि ये सभी प्रोजेक्ट मुख्यमंत्री घोषणा का हिस्सा हैं।
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दून मेडिकल कॉलेज
एनडी तिवारी सरकार के वक्त से इस प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है। इसकी जमीन का मसला फंसा हुआ है। यह बात साफ हो गई है कि इस प्रोजेक्ट के बीच में आने वाले एक पार्क की भूमि पर कोई भी अदालती मामला नहीं है।

अधिकारी पिछले कई साल से यही बता कर प्रोजेक्ट टालते रहे। शासन में वित्त व्यय समिति (ईएफसी) हो चुकी है। अब इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू होना है।

अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज
भाजपा की बीसी खंडूरी सरकार के वक्त घोषित चार मेडिकल कॉलेज में से एक यह भी प्रोजेक्ट है। तब से अब तक इसकी चहारदीवारी का ही काम हो सका। वह भी वर्तमान सरकार ने धन जारी किया तब। इस बीच निर्माण दरें संशोधित (एसओआर) हो गईं। अब नया डीपीआर (विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट) आने के बाद ही इस पर होने वाले वास्तविक खर्च का पता चलेगा।

रुद्रपुर मेडिकल कॉलेज
रुद्रपुर मेडिकल कॉलेज के लिए राज्य सरकार की ओर से प्रारंभिक तौर पर कुछ राशि जारी की जा चुकी है। इसके अस्पताल का काफी काम हो भी चुका है। लेकिन इसमें गड़बड़ी की शिकायत आने के बाद प्रकरण नियोजन विभाग की जांच में अटका पड़ा है। रिपोर्ट नहीं आने के कारण इस पर आगे का काम रुका हुआ है।

नर्सिंग कॉलेज-स्कूल एवं जीएनएम-एएनएम संस्थान
तेरहवें वित्त आयोग में पांच नर्सिंग कॉलेज-स्कूल मंजूर हुए हैं। इसमें देहरादून नर्सिंग कॉलेज भी है, जिसमें कक्षाएं शुरू हो चुकी हैं। मगर बाकी प्रोजेक्ट अब तक शुरू नहीं हो सके। टिहरी, पिथौरागढ़, पौड़ी और अल्मोड़ा का प्रोजेक्ट लटका पड़ा है। हरिद्वार के जीएनएम और पिथौरागढ़ के एएनएम संस्थान के लिए धन भी जारी किया जा चुका है।
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