सावित्री शिक्षा निकेतन जूनियर हाईस्कूल हर्रावाला में अमान्य शैक्षिक प्रमाणपत्र से भर्ती हुए शिक्षकों के मामले में पुलिस ने तत्कालीन अपर जिला शिक्षा अधिकारी कुशला प्रसाद समेत चार अभियुक्तों के खिलाफ चार्जशीट मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में दाखिल कर दी है। इनमें स्कूल के प्रबंधक, प्रधानाचार्य और एक महिला सहायक शिक्षक शामिल है। इन सभी पर धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र रचने का आरोप है। जबकि, इस मुकदमे में दो सहायक शिक्षकों को आरोपमुक्त किया गया है। पुलिस के अनुसार दोनों शिक्षकों के प्रमाणपत्र वर्तमान नियमों के तहत सही पाए गए हैं। इसकी पुष्टि क्षेत्राधिकारी सदर बीएस चौहान ने की है।
यह था मामला
अमर उजाला ने पिछले साल अमान्य और फर्जी शैक्षिक प्रमाणपत्रों से भर्ती हुए शिक्षकों के मामले में महाअभियान चलाया था, जो अब भी जारी है। इसके बाद शासन ने एसआईटी गठित कर फर्जी या अमान्य प्रमाणपत्र से भर्ती हुए शिक्षकों की जांच के आदेश दिए थे। शिक्षा अधिकारी की मिलीभगत से गलत तरीके से नौकरी हथियाने के इस प्रकरण में पहली एफआईआर दर्ज हुई थी। एसआईटी ने जांच में सावित्री शिक्षा निकेतन जूनियर हाईस्कूल हर्रावाला के प्रधानाचार्य अजय कुमार सिंह व तीन सहायक शिक्षकों सुनीता सिंह, नीलम पांडेय और कौशलेंद्र के प्रमाणपत्र अमान्य पाए थे। इनमें अजय, सुनीता और नीलम ने स्नातक के बाद हिंदी साहित्य सम्मेलन से विशारद, बीटीसी के प्रमाणपत्र हासिल किए थे। इसके साथ ही बीएड की डिग्री भारतीय शिक्षा परिषद से ली थी। जबकि, कौशलेंद्र बीपीएड डिग्री धारक हैं। चूंकि, जूनियर हाईस्कूलों में बीपीएड का पद नहीं है, लिहाजा इनकी नियुक्ति को भी अवैध माना गया था। एसआईटी ने जांच में पाया कि 24 मई 2005 में स्कूल के अनुदान सूची में शामिल होने के बाद पूर्व से तैनात शिक्षकों के शैक्षिक प्रमाण पत्रों का सत्यापन नहीं कराया गया था। इस जांच के बाद 15 सितंबर 2017 को एसआईटी ने एफआईआर दर्ज करने की सिफारिश की थी। अक्तूबर 2017 को डोईवाला थाना में मुकदमा दर्ज किया गया था।
किस पर क्या हैं आरोप
तत्कालीन अपर जिला शिक्षा अधिकारी कुशला प्रसाद : 2005 में अपर जिला शिक्षा अधिकारी रहे कुशला प्रसाद पर आरोप है कि इन्हीं की मिलीभगत से सभी शिक्षकों की भर्ती की गई। भर्ती प्रक्रिया में कई अनियमितताएं बरती गईं। प्रमाण पत्रों की जांच, साक्षात्कार, समाचार पत्रों में भर्ती के लिए विज्ञप्ति आदि की जांच नहीं की गई।
स्कूल प्रबंधक यशपाल शर्मा : यशपाल शर्मा पर आरोप है कि उन्होंने भर्ती प्रक्रिया में अनियमितता बरती। उन्होंने भर्ती के लिए न तो कोई विज्ञापन दिया और न ही किसी प्रकार का कोई साक्षात्कार लिया। भर्ती के लिए जरूरी सभी नियमों की अनदेखी की गई।
प्रधानाचार्य अजय कुमार सिंह और सहायक शिक्षिका नीलम पांडेय- अजय और नीलम के बीटीसी के प्रमाणपत्र हिंदी साहित्य सम्मेलन और बीएड डिग्री भारतीय शिक्षा परिषद की है। दोनों संस्थानों के प्रमाणपत्र उत्तराखंड में नौकरी के लिए मान्य नहीं हैं। जानकारी होते हुए भी उन्होंने नौकरी के लिए आवेदन किया और नौकरी पाई।
(सभी भारतीय दंड संहिता की धारा 420 व 120बी(धोखाधड़ी व आपराधिक षडयंत्र) के तहत आरोपी)
ये हुए आरोप मुक्त
सहायक शिक्षक कौशलेंद्र- कौशलेंद्र के बीटीसी और बीएड के तो प्रमाणपत्र अमान्य संस्थाओं के हैं, लेकिन उन्होंने बाद में डीएलएड के लिए आवेदन कर दिया था। पुलिस के अनुसार साल 2017 में मानव संसाधन मंत्रालय के नियमानुसार डीएलएड धारक जूनियर हाईस्कूल में पढ़ा सकते हैं। हालांकि, कौशलेंद्र ने अभी एक वर्ष ही पूरा किया है।
सहायक शिक्षिका सुनीता- सुनीता की बीटीसी व बीएड प्रमाणपत्र अमान्य संस्थानों से है। मगर नौकरी में रहते हुए उन्होंने चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से बीएड की डिग्री प्राप्त कर ली थी। इस आधार पर उन्हें आरोप मुक्त कर दिया गया है।
वन विभाग में एक और भर्ती घोटाला उजागर
हरिद्वार वन प्रभाग में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर तीन कर्मचारियों की नियुक्ति करने का मामला सामने आया है। आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी में प्रकरण उजागर होने के बाद पीएमओ के आदेश पर शासन स्तर से जांच कराई जा रही है। सन 2016 में हुई भर्ती मेें डीएफओ सहित कई अन्य अफसरों ने शैक्षिक दस्तावेजों की जांच कराए गए बगैर नियुक्ति कर दी। उल्लेखनीय है कि राजाजी टाइगर रिजर्व पार्क में कर्मचारियाें की भर्ती में हुई गड़बड़ियों की जांच अभी शासन स्तर से चल रही है। अब इस प्रकरण की भी जांच होने से संबंधित अधिकारियों के होश उड़े हुए हैं।
राजाजी टाइगर रिजर्व पार्क के हरिद्वार वन प्रभाग में सन 2016 में वन आरक्षी पद पर भर्तियां की गईं थीं। जिसमें तत्कालीन डीएफओ समेत अन्य अफसरों ने अभ्यर्थियाें के शैक्षिक दस्तावेजों की जांच कराए बगैर ही नियुक्ति दे दी। अफसरों का यह गोलमाल उस समय उजागर हुआ जब विनोद कुमार जैन ने सूचना के अधिकार के तहत भर्ती किए गए वन आरक्षियों के शैक्षिक दस्तावेजों पर सवाल उठाते हुए जानकारी मांगी। विनोद जैन ने जब दस्तावेजों की अपने स्तर से जांच कराई तो दो वन आरक्षियों के दस्तावेजों में गड़बड़ियां पाई गईं। उन्होंने प्रकरण से सचिव वन को अवगत कराते हुए प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच की मांग की। साथ ही प्रकरण से प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को भी अवगत कराते हुए जांच की मांग की। जिस पर पीएमओ ने प्रमुख सचिव (वन) को जांच कराने के साथ ही कार्रवाई से अवगत कराने के आदेश दिए थे।
मामले में पीएमओ से जांच के आदेश आने के बाद राज्य के संबंधित उच्च अधिकारी हरकत में आए। उप सचिव (वन) ने इस संबंध में प्रमुख वन संरक्षक (प्रशासन) से रिपोर्ट तलब की। जिस पर प्रमुख वन संरक्षक ने 28 मार्च 2018 को शासन को भेजी रिपोर्ट मेें बताया कि तीन वन आरक्षी श्यामलाल पुत्र बाबूराम, विनोद कुमार पुत्र रतनलाल और संतोष कुमार पुत्र मुंशीलाल के दस्तावेजों में खामियां पाई गईं हैं। इनमें श्यामलाल का हाईस्कूल उत्तीर्ण प्रमाण-पत्र उत्तराखंड व यूपी में मान्य ही नहीं है। जबकि विनोद कुमार के शैक्षिक दस्तावेजाें में माता-पिता के नामाें व जन्मतिथि में भिन्नता पाई गई है। तीसरे वन आरक्षी संतोष कुमार के दस्तावेजों के संबंध में सचिव, माध्यमिक शिक्षा परिषद उत्तर प्रदेश की ओर से कोई सूचना नहीं दी गई है। लेकिन संबंधित विद्यालय के प्रधानाचार्य ने जानकारी दी है कि इस नाम और रोल नंबर का कोई भी छात्र व्यक्तिगत परीक्षा में उनके विद्यालय में पंजीकृत ही नहीं है। सवाल उठता है कि इन वन आरक्षियों के शैक्षिक दस्तावेजों जांच किए बिना ही किस आधार पर अधिकारियों ने उनकी नियुक्ति की। यदि प्रकरण की गंभीरता से जांच की गई तो डीएफओ सहित कई अफसरों पर गाज गिर सकती है। उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व राजाजी टाइगर रिजर्व पार्क में फर्जी तरीके से कई कर्मचारियों की भर्ती का मामला सामने आया था। जिसमें पार्क के तत्कालीन उप निदेशक एचके सिंह को आरोप-पत्र भी जारी किया गया है। इस प्रकरण की भी शासन स्तर से जांच कराई जा रही है।