वायुमंडल की शुचिता को बनाए रखने के लिए प्रकृति के इस पर्व को प्राचीन काल से मनाया जाता है। लेकिन इस साल हरियाली अमावस्या की तिथि को लेकर उलझन बनी हुई है।
दरअसल, 31 जुलाई को अमावस्या सुबह 11 बजकर 55 मिनट पर शुरू हो रही है। इसके बाद अमावस्या तिथि 1 अगस्त को सुबह 8 बजकर 45 मिनट पर समाप्त हो रही है।
इस स्थिति में ज्योतिषियों के अनुसार सूर्योदय व्यापिनी तिथि को ही महत्व दिया गया है। इस स्थिति में 1 अगस्त को सूर्योदय के बाद पौधरोपण और पूजन-अर्चन करने से सौभाग्य की प्राप्ति होगी।
कई गुना फल की प्राप्ति के लिए इस दिन विशेष रूप से पीपल, वट, केला, आम, तुलसी, नीम आदि पौधों का रोपण करना चाहिए। उत्तराखंड विद्वत सभा के पूर्व अध्यक्ष पं उदय शंकर भट्ट का कहना है कि वेद-पुराणों में पेड़-पौधों में देवताओं का वास बताया गया है।
गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि मैं वृक्षों में पीपल हूं। आम, नीम, आंवला को देवी का स्वरूप माना जाता है। बेल वृक्ष में भगवान शिव और लक्ष्मी का वास माना जाता है। इसी तरह बरगद में त्रिदेवों का वास माना जाता है।