कहते हैं कि जब बात बन न पाए, उसे वक्त और हालात पर छोड़ देना चाहिए, वक्त और हालात अनुकूल होने पर वह बात खुद-ब-खुद बन जाएगी। इस बात की गवाह इन दिनों उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति भी बन रही है।
प्रदेश कांग्रेस की सियासत में कभी दो अलग-अलग ध्रुव रहे पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी और मुख्यमंत्री हरीश रावत के बीच कुछ समय से टेलीफोन पर बातचीत और चिट्ठी-पत्री के आदान-प्रदान के बाद शनिवार को वह दिन भी आया जब दोनों दिग्गज पुराने गिले-शिकवे भुलाकर साथ-साथ दिखे।
शनिवार को एनडी तिवारी अपनी पत्नी उज्जवला के साथ बीजापुर गेस्ट हाउस पहुंचे। यहां मुख्यमंत्री हरीश रावत उन्हें दरवाजे तक लेने पहुंचे।
हालांकि, दो साल पूर्व हरीश की पुत्री की शादी में भी एनडी तिवारी निमंत्रण मिलने पर शामिल हुए थे लेकिन अब तिवारी की ओर से खुलकर हरीश के समर्थन में बयान देने और सरकार की तारीफ करने से यही संदेश मिल रहा है कि दो अलग-अलग ध्रुव अब एक हैं।
उल्लेखनीय है कि एक वक्त वह भी था जब कई मौके ऐसे आए कि पार्टी को दोनों दिग्गजों के बीच बैलेंस बैठाना तक नामुमकिन था। उस समय प्रदेश की राजनीति में मजबूती के साथ जो दो गुट भिड़ते दिखते थे वह एनडी तिवारी और हरीश रावत का ही खेमा था।
आखिर एनडी ने की हरीश की तारीफ
हरीश रावत से मुलाकात में एनडी ने प्रदेश में हो रहे विकास कार्यों की सराहना की। कहा कि शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद सीएम दिन-रात जिस प्रकार कड़ी मेहनत कर रहे हैं वह प्रशंसनीय है। हिमालयी क्षेत्र के विकास के लिए वे सीएम के साथ पूरा सहयोग करेंगे।
सीएम ने कहा कि तिवारी का आशीर्वाद उन्हें अधिक कार्य करने के लिए प्रेरित करेगा। बता दें कि रावत ने जब सीएम पद की शपथ ली थी तो तिवारी ने फोन पर उन्हें कुछ राजनैतिक टिप्स भी दिए थे।
राज्यपाल रामनाइक को फोन मिलवाया
एनडी तिवारी राज्य की बेहतरी और केंद्र की सरकार से बेहतर संबंध भी चाहते हैं। सीएम से बातचीत के दौरान उन्होंने यूपी के राज्यपाल रामनाइक से संपर्क कर हरीश रावत से बात भी करानी चाही। गौरतलब है कि रामनाइक भाजपा के वरिष्ठ नेता रहे हैं और उनके एनडी से भी अच्छे संबंध हैं।
हर बार हरीश पर पड़े भारी थे एनडी
अपने लंबे राजनैतिक कद और गांधी परिवार से नजदीकियों के चलते तिवारी ने हर बार हरीश रावत को पीछे छोड़ा। हरीश रावत 2002 में ही प्रदेश के सीएम हो गए होते, लेकिन बतौर अध्यक्ष नए प्रदेश में जिस तरह हरीश ने जमीन तैयार कर फसल खड़ी की थी, उसे एनडी ने काट लिया।
उस समय रावत के पास समर्थक विधायकों की लंबी सूची भी थी बावजूद आलाकमान की मुहर तिवारी के नाम पर लगी। 80 के दशक में रावत के तीन बार सांसद बनने के बाद भी तिवारी समर्थक सांसद ब्रह्मदत्त को ही केंद्र में आगे बढ़ने का मौका मिला।
हालांकि, यूपी में सफल सीएम के तौर पर चार बार राजपाट चलाने वाले एनडी के पैर उत्तराखंड में कई बार डगमगाए। उस दौरान हरीश खेमे का वजूद था और उनके बयानों के तीर तिवारी की मुश्किलें बढ़ाते रहे थे। उस वक्त तिवारी अपनी मुश्किलें कम करने के लिए ही प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर यशपाल आर्य को लेकर आए थे।