सिक्कों को देखकर वहां से गुजरते लोगों के कदम ठहर जाते हैं। यह सिक्के प्राचीनकाल के नाम पर नकली होते हैं। सिक्के बेचने वाले दावा करते हैं उनके पास ईसा पूर्व से लेकर मुगल कालीन और ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर के तांबे एवं अन्य धातुओं के सिक्के हैं। सिक्के जितने पुराने बताए जाते हैं, उतनी उनकी कीमत तय करते हैं।
हरकी पैड़ी पर गंगा से निकालते हैं सिक्के
श्रद्धालुओं की आस्था कई गरीबों का भरण पोषण भी करती है। हरकी पैड़ी एवं आसपास के घाटों में 120 लोग गंगा से सिक्के बीनकर गुजर बसर करते हैं। पूरे साल सिक्के बीनने पर ही निर्भर रहते हैं। चंडीघाट निवासी बिहारी लाल बताता है, रोजाना पांच सौ से सात सौ रुपये के सिक्के गंगा से बटोर लेते हैं। कई बार सोना एवं चांदी के आभूषण के कटपीस भी मिल जाते हैं। सोना-चांदी के कटपीस अस्थि विसर्जन की राख में आते हैं।
आज के दौर में हरिद्वार में ईसा पूर्व से लेकर ईस्ट इंडिया कंपनी के असली सिक्के मिलना संभव नहीं है। ईसा पूर्व के एक सिक्के की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में करोड़ों रुपये है। हरिद्वार ही नहीं किसी भी धार्मिक स्थल पर बिकने वाले सिक्के असली नहीं हो सकते हैं। लोगों को असली बताकर बेचना उनकी आस्था के साथ खिलवाड़ है।
- प्रो. देवेंद्र गुप्ता, प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति पुरातत्व विभाग गुरुकुल विश्वविद्यालय