1. एप और नई तकनीक का सहारा
सरकार सर्विलांस सिस्टम को मजबूत कर लेती है तो एक ही जगह पर एकत्र होने वाली भीड़ से सोशल डिस्टेंस का पालन कराना आसान हो सकता है। आरोग्य सेतु एप की तरह ही कुंभ में शामिल होने वाले हर व्यक्ति तक अगर एप के जरिये एक्सेस हो सकती है तो यह कारगर प्लान हो सकता है। इसी लिए सरकार ने सर्विलांस पर खासा जोर दिया है और अन्य उच्च शोध संस्थानों से भी मदद मांगी है।
2. कुंभ की अवधि को कम रखना
कुंभ एक आध्यात्मिक और सांस्कृति आयोजन है और इसमें महत्वपूर्ण तिथियों में देश-विदेश से लोग पहुंचते हैं। कुंभ की अवधि को कम रखा जाता है तो इससे कुंभ के स्वरूप पर फर्क नहीं पड़ता, लेकिन आने वाले लोगों की संख्या जरूर कम हो सकती है।
3. अन्य राज्य से आने वाले लोगों की जांच
सरकार अन्य राज्यों से कह सकती है कि वे जांच कराकर और पास व्यवस्था आदि के जरिए ही लोगों को कुंभ में शामिल होने को कहे। इसी के तहत सरकार ने कहा था कि आने वालों से कोविड निगेटिव सर्टिफिकेट लिया जाएगा। यह भी भीड़ प्रबंधन का हिस्सा है।
4. आवागमन के संसाधनों को सीमित करना
कुंभ में सरकार की ओर से स्पेशल ट्रेन, बस आदि की व्यवस्था की जाती है ताकि ज्यादा लोग आसानी से आयोजन में शामिल हो सकें। इस बार इसकी व्यवस्था न होने के आसार हैं। इस तरह से भी लोगों की संख्या में कमी आ सकती है।
कोरोना वैक्सीन के लिए सरकार केंद्र से कह चुकी है कि पहली प्राथमिकता उत्तराखंड में कुंभ के आयोजन को दी जाए। इस वैक्सीन पर भी निर्भर करेगा कि कुंभ का स्वरूप क्या रहेगा।
कुंभ में सबसे बड़ी समस्या भीड़ प्रबंधन की है और इसको लेकर कई स्तर पर विचार किया जा रहा है। ब्रिटेन का नया स्ट्रेन भी सामने आया है और इससे सरकार की चिंता बढ़ गई है। आगे आने वाले समय में संक्रमण की रफ्तार पर निर्भर करता है कि किस योजना को अपनाया जाएगा। हालात सामान्य रहते हैं तो कुंभ अपने भव्य स्वरूप में होगा और इसकी तैयारी सरकार के स्तर से की जा रही है।
-मदन कौशिक, शहरी विकास मंत्री, उत्तराखंड
केदारनाथ की आपदा के बाद प्रदेश सरकार के सामने भी यह चुनौती थी कि चार धाम यात्रा शुरू की जाए या नहीं। उस समय तत्कालीन सरकार ने मन बना लिया था तो राह भी बन गई थी। मुसीबत यह है कि सरकार इस समय तय ही नहीं कर पा रही है कि उसे करना क्या है। सरकार तय करे तो बाकी लोग भी साथ देंगे। संतों का साथ भी मिलेगा।
-हरीश रावत, पूर्व सीएम, उत्तराखंड