तीनों फक्कड़ हैं और एक दशक से साथ ही रहते हैं। गेरुवा वस्त्र धारण किए तीनों फक्कड़ हरिद्वार में अलग-अलग सड़कों पर अक्सर घूमते दिखते हैं और आवाजाही करने वालों का ध्यान खींच रहे हैं।
शेरू गिरि बताते हैं, हर कुंभ और मेले में जाते हैं।
मेलों में श्रद्धालुओं की श्रद्धा (दक्षिणा) से ही गुजर बसर करते हैं। शेरू बताते हैं, कोई स्थायी ठिकाना नहीं है। तीनों दिनभर भिक्षा मांगते हैं और जहां आसरा मिल जाए वहीं रात गुजारते हैं। कई बार फुटपाथ पर भी रात बिताते हैं। दृष्टिहीन सुरेश गिरि बताते हैं, शेरू ही उनकी आंख है।
तीनों सुख-दुख के सारथी और जीवनभर साथ निभाने की ठानी है। तीनों घर-परिवार छोड़ चुके हैं। ईश्वर गिरि बताते हैं, मेलों को छोड़कर अधिकतर समय मुफलिसी में गुजरता है। मेलों में दक्षिणा के अलावा भंडारों में भोजन भी मिल जाता है।
जब मेले नहीं होते हैं तो दो वक्त की रोटी तक के लिए पैसे नहीं होते हैं। हमेशा तीनों साथ चलते हैं, इसलिए दान दक्षिणा भी अधिक नहीं जुटा पाते हैं। कई बार भूखे पेट रात गुजारनी पड़ती है।