आश्रम और अखाड़ों से लेकर मेला क्षेत्र में श्रद्धालुओं के सैंपल लिए गए हैं। श्रद्धालु भी नेगेटिव रिपोर्ट लेकर मेला क्षेत्र में आए। कोविड की दृष्टि से अतिसंवेदनशील गुजरात, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ से भी श्रद्धालु हरिद्वार आए।
उन्हीं में श्रद्धालुओं के संक्रमित होकर आने से हरिद्वार में संक्रमण का प्रसार शुरू हुआ है। जूना पीठाधीश्वर ने कहा कि संन्यासी संतों के महत्वपूर्ण शाही स्नान हो चुके हैं। जहां तक बैरागियों के 27 अप्रैल के शाही स्नान की परंपरा की बात है उनका स्नान होना चाहिए। मेला प्रशासन और शासन भी इसके लिए प्रतिबद्ध है।
बैरागी अपनी परंपरा से स्नान करें और संन्यासी अब प्रतीकात्मक स्नान ही करेंगे। उन्होंने कहा कि मेला खत्म नहीं हो रहा है। ऐसा भी नहीं कहा जा रहा कि 27 अप्रैल का स्नान नहीं होगा, लेकिन जनता सीमित संख्या में आए और कोविड नियमों का पालन करें।
धर्म और आस्था से बड़ा है जीवन
जूना पीठाधीश्वर ने कहा कि धर्म और आस्था हमारी परंपराएं हैं, लेकिन जीवन और किसी के प्राणों की रक्षा उससे बड़ी है। हमें दूसरों के प्राणों की रक्षा करनी चाहिए। इसलिए कोविड के बढ़ते प्रसार के बीच उनके स्नान प्रतीकात्मक होंगे। उन्होंने कहा कि हरिद्वार से गंभीर स्थिति अन्य राज्यों के शहरों की है। इसलिए श्रद्धालु कम से कम आएं और कोविड नियमों का पालन कर खुद और दूसरों की जान बचाएं।
जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर ने कहा कि अखाड़ों और आश्रमों में लगातार कोरोना सैंपलिंग हो रही है। संत भी कोविड नेगेटिव रिपोर्ट लेकर आ रहे हैं। उनके आश्रम के अलावा अधिकतर आश्रमों में बिना नेगेटिव रिपोर्ट प्रवेश नहीं है। वह खुद 12 बार अपनी कोविड जांच करवा चुके हैं। संन्यासी अखाड़ों के संत भी जांच करवाने आगे आ रहे हैं और सतर्कता एवं सावधानी बरत रहे हैं।
श्री निरंजनी ने अपने अखाड़े की घोषणा की
अवधेशानांद गिरि ने कहा कि श्री निरंजनी अखाड़े ने महाकुंभ समापन की नहीं बल्कि अपने अखाड़े से जुड़े संतों का मेला खत्म करने की घोषणा की है। 14 अप्रैल के शाही स्नान के बाद प्राय: संन्यासियों के स्नान पूरे हो जाते हैं। आखिरी शाही स्नान बैरागी करते हैं और यही इतिहास रहा है।
बातचीत के बाद प्रधानमंत्री का ट्वीट
आचार्य महामंडलेश्वर पूज्य स्वामी अवधेशानंद गिरि जी से आज फोन पर बात की। सभी संतों के स्वास्थ्य का हाल जाना। सभी संतगण प्रशासन को हर प्रकार का सहयोग कर रहे हैं। मैंने इसके लिए संत जगत का आभार व्यक्त किया।
मैंने प्रार्थना की है कि दो शाही स्नान हो चुके हैं और अब कुंभ को कोरोना के संकट के चलते प्रतीकात्मक ही रखा जाए। इससे इस संकट से लड़ाई को एक ताकत मिलेगी।