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यहां भी मोदी जी का इंतजार कर रही है मां गंगा

Fri, 10 Feb 2017 11:57 AM IST
मेहताब आलम / अमर उजाला, हरिद्वार
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नरेंद्र मोदी - फोटो : ANI
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'मैं वाराणसी खुद यहां नहीं आया हूं, मुझे मां गंगा ने बुलाया है।' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव के दौरान 24 अप्रैल 2014 को अपना नामांकन करते हुए वाराणसी में ये उद्गार व्यक्त किए थे।
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हरिद्वार में भी मोक्षदायिनी गंगा का दर्द वाराणसी से कम नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी की महत्वकांक्षी योजना नमामि गंगे आठ महीने में भी धरातल पर नहीं उतर सकी। गंगा को प्रदूषणमुक्त बनाने के लिए एनजीटी के तमाम आदेश भी फाइलों से बाहर नहीं आ सके। नालों की गंदगी और सीवर गिरने से गंगा मैली की मैली है।

प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी पहली बार धर्मनगरी पहुंच रहे हैं। ऐसे में कराहती गंगा को उनसे ढेरों उम्मीदें हैं। यह भी देखने लायक होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हरिद्वार में गंगा की दुर्दशा को लेकर क्या कहने और क्या करने वाले हैं।      
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नमामि गंगे प्रोजेक्ट फाइलों में कैद  

नमामि गंगे
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बहुत खास योजनाओं में से एक नमामि गंगे योजना का शुभारंभ हरिद्वार में सात जुलाई 2016 को हुआ। जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती, सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी समारोह में शामिल हुए थे।

करीब दो हजार करोड़ रुपये की इस योजना के तहत गंगा किनारे के 104 गांव, शहर व कस्बों से गंगा में गिरने वाले गंदे नालों और सीवर को रोकना है। आठ माह से हरिद्वार में ही योजना कागजों से बाहर नहीं आ पाई और करोड़ों की योजना का अभी तक का नतीजा शून्य है।      

एनजीटी के आदेश भी दरकिनार      
गंगा स्वच्छता की दिशा में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल 10 से ज्यादा आदेश जारी कर चुका है। जिसमें गंगा में गंदगी रोकने और पॉलीथिन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए नगर निगम व प्रशासन की सीधे तौर पर जिम्मेदारी तय की गई है। लेकिन हरकी पैड़ी पर ही एनजीटी के आदेशों का खुला उल्लंघन हो रहा है। पैड़ी क्षेत्र में गंगा किनारे पॉलीथिन व प्लास्टिक से लेकर लंगर भी चलाए जा रहे हैं। जबकि नगर निगम का बॉयलाज भी इसकी इजाजत नहीं देता।
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गंगा में गिर रहे गंदे नाले व सीवर      

गंगा में बहता नगवां नाला का पानी।
हरिद्वार में ही एक दर्जन से ज्यादा गंदे नाले गंगा में सीधे गिर रहे हैं।  होटल, धर्मशालाओं और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के साथ ही कई आश्रमों से भी सीवर की गंदगी सीधे गंगा में डाली जा रही है। 

बस्तियों का मल मूत्र भी गंगा में      
गंगा किनारे बसी अवैध बस्तियां भी गंगा के लिए नासूर साबित हो रही हैं। मायापुर से लेकर ज्वालापुर जटवाड़ा पुल तक 50 हजार से ज्यादा आबादी गंगा किनारे अवैध बस्तियों में निवास करती है। इनमें कुछ जगहों पर सीवर लाइन डाली गई है। अधिकांश आबादी का मल मूत्र सीधे गंगा में गिरता है। हरिद्वार दिल्ली हाईवे की ओर से इन बस्तियों का सीवर सहित कूड़ा कचरा गंगा में गिरता हुआ साफ देखा जा सकता है। 

गंगा के अस्तित्व के लिए खनन भी बड़ा मुद्दा      
गंगा का अस्तित्व बचाने के लिए अवैध खनन भी बड़ा मुद्दा है। खनन माफिया और अफसरों की सांठगांठ से खुलेआम गंगा का सीना चीरा जाता है। राजनीतिक संरक्षण के चलते केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से लेकर हाईकोर्ट तक के आदेशों को अफसर गंभीरता से लेने को तैयार नहीं है। गंगा में अवैध खनन के खिलाफ आध्यात्मिक संस्था मातृ सदन ही मुखर दिखाई पड़ती है। दो दशक लंबी लड़ाई में मातृसदन को अपने युवा संत का बलिदान भी देना पड़ा है। पिछले दिनों मातृसदन के परमाध्यक्ष स्वामी शिवानंद महाराज ने अपने अनशन के दौरान इच्छा मृत्यु के संबंध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी 225 पेज की चिट्ठी भेजी थी। 
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