गुलदार का आतंक इन दिनों चरम पर है। देहरादून की घनी आबादियों तक गुलदार आ रहे हैं। इसके पीछे कई कारण माने जा रहे हैं, जिसमें एक गुलदार का प्रजनन काल भी है।
मेटिंग सीजन में गुलदारों को असुरक्षा का भाव रहता है और वह इंसान दिखने पर हमला कर देता है। विशेषज्ञों के मुताबिक फरवरी तक यह सीजन चलेगा। वन्य जीव विशेषज्ञ डॉ. धनंजय मोहन का कहना है कि गुलदारों का मेटिंग टाइम भी क्षेत्र के हिसाब से बदल जाता है।
मसलन, राजाजी पार्क के सुनसान जंगलों में दिन में भी मेटिंग कपल देखने को मिल जाता है, लेकिन आबादी से सटे इलाकों में या तो अलस्सुबह या फिर शाम ढलने के बाद ही मेटिंग टाइम होता है।
उन्होंने बताया कि इस दौरान कोई इंसान इनके आसपास आता है तो यह असुरक्षा की भावना महसूस करते हैं। इस वजह से वह इंसानों पर हमला बोल देते हैं।
सात साल बाद गुस्साया गुलदार
डॉ. आरएस नेगी ने बताया कि प्रजनन काल में गुलदार का स्वभाव भी बदल जाता है। वह आम दिनों की तुलना में ज्यादा गुस्सैल हो जाते हैं।
वन्य जीवों के लिए काम करने वाले डा. अभिषेक सिंह का कहना है कि प्रजनन काल के अलावा गुलदारों के लगातार बढ़ते हमलों के पीछे इनकी जनसंख्या में बढ़ोतरी भी हो सकती है।
सात साल बाद गुस्साया गुलदार
प्रदेश में सात साल बाद अचानक गुलदार के हमले के मामले बढ़ गए हैं। वर्ष 2007 में 59 लोग गुलदार का शिकार हुए थे। इनमें 24 लोग मरे थे और 35 घायल हुए थे। वर्ष 2008 में 31, वर्ष 2009 में 23, वर्ष 2010 में 11, वर्ष 2011 में 28, वर्ष 2012 में 10 और वर्ष 2013 में चार लोग पूरे प्रदेश में गुलदार का शिकार बने।
इस साल अभी तक कुल 32 लोग गुलदार हमले का शिकार हो चुके हैं। इसमें 13 लोगों की मौत और 19 लोग गंभीर रूप से घायल हुए। हाल ही में मक्कावाला में एक वृद्धा को गुलदार ने अपना शिकार बना लिया था।
सुबह-शाम बरतें सावधानी
- सुबह और शाम पांच बजे के बाद जंगल से सटे क्षेत्र में न जाएं। जाना जरूरी हो तो हाथ में डंडा जरूर रखें।
- अकेले जाने के बजाए अगर समूह में ऐसे इलाके से गुजरें तो ज्यादा बेहतर होगा। गुलदार आमतौर पर ऐसे समूहों पर हमला नहीं करता है।
- विशेषज्ञों के मुताबिक गुलदार का प्रजनन काल फरवरी तक माना जाता है। तब तक बाहर आने-जाने में एहतियात बरतें।
- अपने बच्चों को ऐसी जगहों पर न जाने दें, जहां गुलदार दिखने का मामला प्रकाश में आया हो।