प्रदेश में गेस्ट टीचरों की तैनाती शुरू से ही सवालों के घेरे में रही है। इसके बावजूद इस तरह की नीति बना दी गई कि गेस्ट टीचरों को साल भर रोजगार मिला और इसके बाद वे फिर बेरोजगार हो गए। इस व्यवस्था से नाराज गेस्ट टीचर अब सरकार की नीति पर सवाल उठा रहे हैं।
प्रदेश में शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने के लिए सरकार की ओर से गेस्ट टीचरों की व्यवस्था की गई। सितंबर 2015 में इन्हें तैनाती दी गई। लेकिन 31 मार्च 2016 को इनकी सेवाएं समाप्त कर दी र्गइं। इसके बाद से गेस्ट टीचर अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत हैं।
यह स्थिति तब है, जबकि राष्ट्रपति शासन के दौरान मुख्यमंत्री न रहते हुए हरीश रावत और शिक्षा मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी इनकी मांगों का समर्थन करते हुए इनके साथ धरना तक दे चुके हैं। गेस्ट टीचरों के बाहर होने से स्कूलों में जहां बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ रहा है, वहीं छह हजार से अधिक बेरोजगार सड़कों पर हैं।
सवाल यह है कि प्राविधिक शिक्षा परिषद और लोक सेवा आयोग में शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति के लिए अधियाचन क्यों नहीं किया गया। इसके अलावा शिक्षक चयन आयोग का गठन कर भी बेरोजगारों को स्थायी नियुक्ति दी जा सकती थी।
सरकार को गेस्ट टीचरों के लिए इस तरह की नीति नहीं बनानी चाहिए थी, जिसमें कुछ समय रोजगार के बाद उन्हें बाहर कर दिया जाए। इस नीति का खामियाजा हजारों बेरोजगारों को भुगतना पड़ रहा है।
-विजय पोखरियाल, प्रदेश संरक्षक गेस्ट टीचर संघ
गेस्ट टीचरों के मामले में विभाग को अब तक कोर्ट का आदेश नहीं मिला, आदेश मिलने के बाद ही कुछ किया जा सकेगा। इससे पहले विभाग ने कोई कदम उठाया तो यह कोर्ट की अवमानना का मामला बन सकता है।
-आरके कुंवर, शिक्षा निदेशक माध्यमिक शिक्षा