इलाज के नाम पर राजकीय मानसिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराकर उनसे कन्नी काटने वाले रिश्तेदारों की अब खैर नहीं। ऐसे 10 परिवारों को नि:शक्त जन आयोग ने नोटिस जारी कर कोर्ट में तलब किया है।
आदेश प्राप्त होने के 15 दिन के भीतर यदि वे हाजिर नहीं होते हैं तो आयोग इसे नि:शक्त जन अधिकार अधिनियम के तहत उनके संरक्षण और भरण-पोषण के लिए धनराशि वसूलने की कार्यवाही अमल में लाएगा। यही नहीं उनकी जमीन-जायदाद का हिस्सा भी मनो रोगियों के नाम किया जाएगा।
बता दें कि सेलाकुई स्थित स्वास्थ्य केंद्र में इलाज कराने के बहाने से छोड़े गए कई मनोरोगियों की हालत स्थिर हो चुकी है, मगर परिजन और सगे-संबंधी उन्हें घर ले जाने को तैयार नहीं। इनमें महिला मनोरोगी भी शामिल हैं। ये सभी उत्तराखंड के ही हैं। एक मामला पश्चिम बंगाल का भी है। संस्थान पूरी तरह से पैक हो चुका है। हर दिन केस आ रहे हैं। इलाज के लिए उन्हें संस्थान में भर्ती करना जरूरी है, मगर स्थिर हालत वाले जाएं तो उनके लिए जगह बने। अब मजबूर होकर संस्थान को आयुक्त नि:शक्तजन के न्यायालय से अपील करनी पड़ी है।
उनकी अपील पर आयुक्त ने 10 परिवारों को नोटिस जारी कर 15 दिन में कोर्ट में उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं। इन लोगों में रोगियों के माता-पिता और परिजन शामिल हैं। आदेश में परिजनों के व्यवहार को नि:शक्तजन व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम-2015 का उल्लंघन माना गया है। परिजनों को आगाह किया गया है कि यदि वे उपस्थित नहीं होंगे तो अधिनियम की धाराओं के तहत नि:शक्त व्यक्ति के अधिकारों के संरक्षण एवं उनके भरण-पोषण के लिए धनराशि वसूलने और उनको देय जमीन जायदाद उनके नाम करने की कार्रवाई की जाएगी।
मानसिक रोगी नि:शक्तजन की श्रेणी में आता है। उसके प्रति भेदभाव करना या उसके अधिकारों का संरक्षण एवं भरण-पोषण परिजनों की जिम्मेदारी है। उनकी हालत स्थिर हो चुकी है तो परिजनों को उन्हें घर ले जाना चाहिए। परिजनों ने जवाब मांगा गया है। संतोषजनक जवाब न मिलने पर आदेश के अनुरूप कार्रवाई जाएगी।
- मनोज चंद्रन, आयुक्त नि:शक्तजन, उत्तराखंड
संस्थान में 30 बैड हैं, लेकिन मनोरोगियों की संख्या बढ़ रही है। तकरीबन सभी मनोरोगी स्थिर हैं। लेकिन कुछ का कोई पता-ठिकाना नहीं है। जिनके रिश्तेदार व सगे-संबंधी हैं वे उन्हें ले जाने को तैयार नहीं। संस्थान में हर दिन औसतन चार मनोरोगी ऐसे हैं, जिन्हें भर्ती किया जाना है, लेकिन बैड खाली नहीं है। स्थिर मनोरोगियों को उनके परिजन घर नहीं ले जा रहे हैं। उनसे हम संपर्क करते हैं, लेकिन वे टालमटोल करते हैं।
- डॉ. रविंद्र नवानी, सीएमएस, राजकीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान, सेलाकुई