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उत्तराखंड को फिर नहीं मिला लोकायुक्त, राज्यपाल ने लौटाई फाइल

Tue, 30 Aug 2016 02:32 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
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गवर्नर केके पॉल - फोटो : amar ujala
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लोकायुक्त की नियुक्ति की कवायद एक बार फिर बेकार साबित हो गई। अब उत्तराखंड को लोकायुक्त के लिए फिर इंतजार करना पड़ेगा। राज्यपाल डॉ. केके पाल ने चयन समिति और खोजबीन समिति के स्तर पर नियमों का पालन न किए जाने के तर्क के साथ हाल ही में फाइल शासन को वापस भेज दी है।
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फाइल वापसी के पीछे, उप्र लोक सेवा अधिकरण अधिनियम-1976 का उल्लंघन होना अहम वजह माना जा रहा है। राज्यपाल ने चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए पूरी प्रक्रिया नए सिरे से करने के निर्देश दिए हैं।

राज्य के नए लोकायुक्त के लिए सलेक्शन कमेटी और सर्च कमेटी ने हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज जेसीएस रावत का नाम फाइनल करके राज्यपाल को फाइल भेजी थी। गौरतलब है कि राज्य गठन के बाद जस्टिस रजा शाह सबसे पहले लोकायुक्त बने थे। उनके बाद जस्टिस घिल्डियाल ने बतौर लोकायुक्त राज्य में तैनाती पाई। उनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद से यह पद खाली पड़ा था। दोबारा लोकायुक्त की तैनाती के लिए राज्य में मौजूदा कांग्रेस सरकार ने उत्तराखंड लोकायुक्त अधिनियम-2011 बनाया। लोकायुक्त के चयन की लंबी प्रक्रिया चली।
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सर्च कमेटी के सदस्यों पर उठे सवाल

मुन्ना सिंह चौहान - फोटो : AmarUjala
मगर बीती एक जुलाई को भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता मुन्ना सिंह चौहान ने राज्यपाल को एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें लोकायुक्त के चयन संबंधी तमाम शिकायतें दर्ज थीं। ज्ञापन में कहा गया था जिस सर्च कमेटी ने यह नाम फाइनल किया है, उसमें एक सदस्य हाईकोर्ट के पूर्व जज भंवर सिंह और लोकायुक्त के लिए प्रस्तावित पूर्व जस्टिस जेसीएस रावत पर गाजियाबाद में हुए सात करोड़ के पीएफ घोटाले में आंच आई थी।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर शुरू हुई जांच में जस्टिस जेसीएस रावत से भी सीबीआई ने पूछताछ की थी। साथ ही नेता प्रतिपक्ष, जो सेलेक्शन कमेटी के सदस्य होते हैं, को भी जजों के बैकग्राउंड के बारे में जानकारी नहीं दी गई थी।

इसके अतिरिक्त पूर्व में उप्र लोकायुक्त अधिनियम-1975 में साफ उल्लेख है कि लोकायुक्त जो स्वायत्तशासी (ऑटोनॉमस बाडी) होगा और राज्य सरकार के नियंत्रण से मुक्त होगा, मगर उत्तराखंड लोकायुक्त अधिनियम-2011 में इसका कोई उल्लेख ही नहीं है। इससे भी भ्रम की स्थिति बनी हुई थी। इसके अतिरिक्त जस्टिस रावत पब्लिक सर्विस ट्रिब्यूनल (लोक सेवा अधिकरण) के भी चेयरमैन रहे हैं।

पारदर्शिता पर टिप्पणी के साथ राजभवन ने लौटाई फाइल

मुन्ना सिंह चौहान - फोटो : AmarUjala
नियम यह है कि इस अधिकरण के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद राज्य सरकार के अधीन किसी पद पर नियुक्त नहीं हो सकते हैं। उत्तराखंड लोकायुक्त अधिनियम-2011 में भ्रम होने के चलते भी जस्टिस रावत की नियुक्ति के प्रस्ताव पर सवाल खड़ा हो गया। ऐसे तमाम बिंदुओं की जांच के बाद आखिरकार राजभवन से फाइल वापस शासन में लौट आई है। इसमें पारदर्शिता का अभाव होने संबंधी टिप्पणी भी की गई है। साथ ही दोबारा पूरी प्रक्रिया करने के निर्देश राजभवन से दिए गए हैं।

भ्रष्टाचार के खिलाफ जिस तंत्र को विकसित कर रहे हैं, उस तंत्र का संचालन ही यदि भ्रष्टाचार के आरोपी करेंगे तो लोकायुक्त बनाने का क्या लाभ? हमें इस बात की खुशी है कि राज्यपाल ने हमारी आपत्तियों को गंभीरता से लिया। यह भी पता चला है कि राज्यपाल ने पारदर्शिता न बरते जाने को लेकर टिप्पणी की है। इससे लगता है कि सरकार ने लोकायुक्त चयन के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए हैं।
-मुन्ना सिंह चौहान, प्रदेश प्रवक्ता (भाजपा)

'भाजपा हमेशा से अड़ंगा लगाती है, हम फिर उबर जाएंगे'

हरीश रावत - फोटो : Self
फाइल वापस करना राज्यपाल का फैसला है। वे एक संवैधानिक पद पर हैं। उनके फैसले पर कोई टिप्पणी करना उचित नहीं होगा। फाइल आने के बाद उसका अध्ययन किया जाएगा। उसके बाद ही कुछ कहना संभव होगा। भाजपा हमेशा से अड़ंगा लगाती रही है, जैसे पहले उबरे वैसे फिर उबर जाएंगे। राज्य को एक प्रभावी लोकायुक्त देने का प्रयास जारी रहेगा।
-हरीश रावत, मुख्यमंत्री

यह थी सलेक्शन कमेटी
अध्यक्ष के तौर पर मुख्यमंत्री और सदस्य के रूप में हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस का प्रतिनिधि, जस्टिस बिष्ट, जस्टिस इरशाद हुसैन, विधानसभा अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष।

यह थी सर्च कमेटी
अध्यक्ष के तौर पर भूतपूर्व चीफ जस्टिस बीएस वर्मा और सदस्य के रूप में जस्टिस भंवर सिंह, पूर्व मुख्य सचिव आरएस टोलिया, भारत सरकार से सेवानिवृत्त सचिव विभापुरी दास, कूर्मांचल बैंक के चेयरमैन राजीव शाह।

यह है मामले की पृष्ठभूमि
कांग्रेस की सरकार आने के बाद विधानसभा के विशेष सत्र में राज्य सरकार ने भाजपा की खंडूड़ी सरकार के लोकायुक्त एक्ट को निरस्त करके केंद्र के लोकपाल बिल को ही स्वीकार कर लिया था। विधानसभा से पारित होने के बाद विधेयक को राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजा गया। केंद्र के लोकपाल बिल में नियम था कि किसी लोक सेवक (आल इंडिया सर्विस के अफसर) के खिलाफ वृहद स्तरीय जांच या अभियोग चलाने के लिए केंद्र से मंजूरी लेनी होगी, क्योंकि लोकायुक्त की कार्यवाही केंद्रीय भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 केतहत संचालित होगी। कुछ कानूनी विशेषज्ञों का यही कहना था कि जब केंद्रीय एक्ट से लोकायुक्त की कार्यवाही संचालित होनी है तो फिर लोक सेवकों के खिलाफ कार्रवाई के लिए केंद्र से ही अनुमति ली जाए।
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सेलेक्शन कमेटी पर उठ चुके हैं सवाल

सीएम हरीश रावत - फोटो : AmarUjala
लोकायुक्त चयन समिति में मुख्यमंत्री, विधानसभाध्यक्ष, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, नेता प्रतिपक्ष के होने का प्रावधान है। इस कमेटी की एक बैठक में तय हुआ था कि जस्टिस इरशाद हुसैन को विधि विशेषज्ञ के तौर पर शामिल किया जाए।

जस्टिस इरशाद को सलेक्शन कमेटी में शामिल करने का निर्णय हो गया तो फाइल मंजूरी के लिए राजभवन पहुंची। राजभवन ने फाइल को वापस करते हुए शासन से जानना चाहा कि आखिर किस नियम के तहत जस्टिस हुसैन को सलेक्शन कमेटी में शामिल किया गया।

राजभवन कमेटी के गठन केतरीकेसे भी संतुष्ट नहीं था। इसके अलावा लोकायुक्त की पांच सदस्यीय खंडपीठ के बजाए सरकार पूर्व में केवल अध्यक्ष की नियुक्ति करने के मूड में दिखी और इस पद के लिए भी एक विवादित पूर्व न्यायाधीश का नाम आने से कई तरह की कयासबाजी का दौर चला था।
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