आबकारी नीति को लेकर सरकार बहके और लड़खड़ाए न इसके लिए नेताजी बहुत चिंतित दिखे। विधानसभा के भीतर और बाहर ढेरों कागजी तर्क और स्वत बढ़ रहे राजस्व की दलील भी दी।
सरकार भी आबकारी से होने वाली कमाई के पुराने स्टाइल को छोड़ नए तरीके से और राजस्व बढ़ाना चाहती है। पर नेता जी की तरफ से लगातार उगली जा रही आग की तपिश से सरकार लंबे समय से बचने की कोशिश करती रही। आखिर सरकार के हाथ एक मौका लग ही गया।
बीमार हैं नेताजी
बोलने के शौकीन नेता जी इन दिनों बीमार हैं उन्हें बीमारी भी ऐसी वैसी नहीं गले की। बस सरकार की टाइमिंग सटीक रही। इस दौरान अपने मन की कर डाली।
बोल बोल कर सरकार को चुप्पी साधने पर मजबूर करने वाले बीमार नेताजी इन दिनों खामोश हैं। सरकारी के करीबी भी राहत महसूस कर रहे हैं। कहते हैं गले में खिच खिच नो किच किच।