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दून के ऑफिसों की सात दिलचस्प कहानियां

Tue, 12 Aug 2014 05:49 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
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1- इसलिए अब वह कुछ करते ही नहीं
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एक दिन में चार घोषणाएं। साहब की आदत है। अब तो कर्मचारी भी साहब की घोषणाओं पर सिगरेट की धुएं के छल्ले उड़ाते हैं।

साहब, अक्सर ताकीद करते हैं कि वह शहर के लिए कुछ करना चाहते हैं। वह बहुत हार्ड वर्कर है। फिर एक नई घोषणा कर देते कि अब इस दिन से शहर में यह होगा। दूसरे दिन अखबारों में साहब की फोटो भी छपती और खबर भी।

घोषणा करते-करते साहब को 15 दिन हो गए। लेकिन हुआ कुछ नहीं, अब न कोई उन्हें गंभीरता से लेता है और न ही अखबार। अब साहब, नए पैंतरे तलाश रहे हैं अखबरों में बने रहने के लिए। इसलिए अब वह कुछ करते ही नहीं।
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2- कार्ड के चक्कर में परेशान हो गए
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना के तहत शहर के आंगनबाड़ी केंद्रों में फार्म तो भरे गए, लेकिन इन फार्मों ने जिला पूर्ति विभाग के अधिकारियों के पसीने छुड़ाए हुए हैं।

विभागीय अधिकारी व कर्मचारी पर्चियां लेकर पहुंच रहे लोगों से परेशान हो चुके हैं। सोमवार के एक अधिकारी के पास कुछ लोग पर्चियां लेकर पहुंचे और कार्ड मांगने लगे, तो वह अधिकारी सिर पकड़कर बैठ गया। बोला इस खाद्य सुरक्षा योजना ने तो हमारा जीना हराम कर दिया है।

कार्ड भरे आंगनबाड़ी केंद्रों में और मुसीबत हमारे लिए हो गई। वहां से फार्म जो मिले हमने बना दिए, अब जो मिले ही नहीं तो कार्ड कहां से बनाएं। लोगों को समझा-समझा कर परेशान हो गए हैं।

चलो अब अपनी भी ‘पावर’ चलेगी

3- चलो अब अपनी भी ‘पावर’ चलेगी
जनता को ‘पावर’ देने का जिम्मा जिन विभागों पर है उसी के कर्मचारी से लेकर अधिकारी तक अपनी जिम्मेवारी निभाने की बजाय अपनी-अपनी ‘पावर’ मजबूत करने में लगे हैं। अब जनता को ‘पावर’ मिले न मिले इनकी बला से।

इस ‘पावर’ गेम का खेल यहां हाल ही खूब सुखिर्यों में रहा। प्रबंधन से एक गुट की ‘पावर’ बढ़ती देख दूसरा गुट भी सक्रिय हो गया। हमारे गुट के फलां अधिकारी का प्रमोशन रह गया, फलां का ट्रांसफर कर दिया गया, जबकि दूसरे गुट वालों के दोनों हाथों में लड्डू हैं, प्रमोशन भी पा रहे हैं और सालों से राजधानी में भी डटे पड़े हैं...वगैरह, वगैरह। बस फिर क्या था ‘पावर’ दिखाने के लिए काम बंद करने की चेतावनी दे डाली।

अब मामला ‘पावर’ का था तो बड़े साहब तक चिंतित हो गए। ‘पावर’ वालों को सख्त हिदायत दी कि काम बंद नहीं होना चाहिए। जैसा भी हो मसले को निपटाओ। कुछ ही दिनों बाद मामला सबकी समझ में आ गया।

‘पावर’ वाले अधिकारियों को झुकना पड़ा और अब यह दूसरा गुट कहते फिर रहा है कि अब तो अपनी भी ‘पावर’ बढ़ गई।

4- महोदय को चाहिए रिफ्रेशर कोर्स
महोदय हिंदी और संस्कृत के विद्वान कहे जाते हैं, लेकिन पढ़ाई किए इतना जमाना गुजर चुका कि व्याख्यानों में छात्रों के सवालों पर अक्सर कन्फ्यूज हो जाते हैं। उनका प्रिय डायलाग होता है-कल बताता हूं।

एक सरकारी विभाग में उन्हें व्याख्यान के लिए बुलाया गया तो उनकी पोल खुल गई। यहां व्याख्यान के बाद सवाल-जवाब का सेशन भी रखा गया। उन्होंने आदत के मुताबिक अपना प्रिय डायलाग मारा तो उपस्थित लोग चेहरे पर मुस्कान लिए कानाफूसी में मशगूल हो गए।

एक ने तो सरकारी शिक्षकों के लिए रिफ्रेशर कोर्स तक कराए जाने की सिफारिश कर डाली। महोदय को यह सिफारिश रास तो नहीं आई, लेकिन मजबूर थे क्या करते? हां-में-हां मिलाने लगे।

5- कहीं ऐसा तो नहीं
इन दिनों शहर में एक दलाल के सक्रिय होने की खबर एक वन विभाग के अधिकारी को चिंता में डाले हुई है। अधिकारी महोदय का तबादला होना है।

सूची में उनका नाम है, इसकी उन्हें जानकारी मिल चुकी है लेकिन अब दलाल के नाम पर उनकी चिंता बढ़ गई है। जनाब को यह तलाशने की कोशिश में हैं कि कहीं यह दलाल किसी और अधिकारी से पैसे खाकर उनका तबादला न बदलवा दे।

बहरहाल, इन दिनों वन विभाग में सभी अधिकारी इस सूची का इंतजार कर रहे हैं लेकिन बताया जा रहा है कि सूची में 60 प्रतिशत बदलाव होने के बावजूद सरकार इसे दबाए बैठी है।
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दीदी का इगो हर्ट हो गया

6- दीदी का इगो हर्ट हो गया
सुबह-शाम महानगर की मुखिया दीदी का पैर-छूने वाले छोटे भाई ने जब अपने संगठन की कार्यकारिणी घोषित कर दी तो बवाल मच गया। दीदी आग-बबूला हो गईं।

आनन-फानन में नई कार्यकारिणी पर ‘फायर’ कर दिया। बात प्रदेश के मुखिया तक गई।

हर तरफ भटककर छोटा भाई फिर दीदी की शरण मेंपहुंचा, पैरे छूते ही दीदी द्रवित हो गईं। बोलीं-अरे नादान, एक बहन को और कार्यकारिणी में शामिल कर लेता तो क्या हो जाता?

भाई ने झट से उस बहन को मंत्री बना दिया। चेली सेट हो गई तो दीदी का कलेजा ठंडा हुआ।

7- ऐसी लगाई मार, हो गए लाचार
इन दिनों एक नामी कालेज के प्राचार्य चर्चाओं में हैं। अक्सर छात्रों के विरोध और बयानबाजी का शिकार होने वाले प्राचार्य पर छात्र आरोप लगा रहे हैं कि एडमिशन मामले में आया फैसला इनके दिमाग की ही उपज है।

छात्रों का कहना है कि प्राचार्य महोदय भी पुराने नेता हैं, अपनी पर आ गए तो लगा दी सबकी लंका। जरा सी बात पर हंगामा करने वाले छात्र अपना ऐसा हाल देखकर लाचार हैं। समझ नहीं आ रहा कि विरोध करें तो भी कैसे।
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