राजधानी देहरादून में एक चर्चित मामले के केस के लिए वकील साहब के बीच डग्गामारी चल रही है। चर्चित मामला है ऐसे में टीवी और समाचार पत्रों में छपने के लिए एक साहब ने अपनी जेब से हजारों रुपए फूंक दिए।
वहीं दूसरे साहब भी पीछे नहीं हैं। स्थिति यह है कि इनकी जेब में अभी तक आया तो कुछ नहीं है, लेकिन खुद की जेब से पैसा जरूर निकल रहा है। लेकिन इन्हें चिंता नहीं है, क्योंकि मीडिया में इनका नाम जो छाया हुआ है।
कह रहे हैं कि दुकान चमक जाएगी तो एक दिन चल भी जाएगी। तब खाली जेब की भरपाई भी हो जाएगी। अभी तो निवेश का समय है...।
अच्छा सादा है! आधा दे-दो
विकास भवन हो और चाहे कलक्ट्रेट इस वक्त तंबाकू से बने उत्पादों को इस्तेमाल करने वालों पर शामत है। सिगरेट, बीड़ी, खैनी आदि के लती इसे बुरे वक्त का फेर मान रहे हैं। कभी सीना तान कर सीट पर धुआं-धक्कड़ करने वाले अब चोरों की सी मन: स्थिति में हैं।
टॉयलट का बहाना करते हैं कोने-अंतरे में जाकर ऐसे सिगरेट पीते हैं कि धुआं गोपनीय रहे। बहरहाल, विकास भवन में जब बीड़ी पीते वक्त एक साथी को ढाई सौ रुपये जुर्माने की चपत लगी तो रजनीगंधा और तुलसी लेकर आ रहे एक कर्मचारी महोदय मुट्ठी बगल में दबा दूसरी तरफ भागे।
सामने से आ रहे एक अधिकारी ने उनके मन का चोर पकड़ लिया। गुर्रा कर बोले-‘मुट्ठी में क्या है? खोलो।’ सकपकाया कर्मचारी मुंह तो खोल न सका, मुट्ठी खोल दी। कर्मचारी की हथेली पर निगाह डाल साहब मुस्कराए।
पहले आहिस्ता से तुलसी का पाउच उठा पैंट की जेब में डाला। फिर शफकत भरे लहजे में पास में खड़े दो अफसरों को सुनाते बोले-अच्छा सादा है, कोई बात नहीं। लेकिन तंबाकू मत खाना.. ठीक। फिर धीमे से कहा आधा रजनीगंधा दो।
हर कोई था आश्चर्य में
दून में एक विभाग के वह प्रबंध निदेशक जो कभी कर्मचारियों से बात नहीं करते थे, उनसे मिलने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता था।
यही नहीं बाहर से आने वाले कई लोगों को मिलने आने के बावजूद तीन दिनों का समय देकर लौटा देते थे, वह आंदोलन के दौरान कर्मचारियों के बीच पहुंच गए। यह देख कर्मचारी आश्चर्य में पड़ गए। लेकिन खुश भी थे कि कम से कम कर्मचारियों और एमडी के बीच सीधे संवाद हो सकेगा। धरना स्थल पर सब यही कह रहे थे कि अब कम्युनिकेशन गैप खत्म हो जाएगा।
सुरक्षा कवच बनाने में लगे साहब
जमाने भर के लोगों की बीमारी भगाने वाले साहब आजकल खुद दर्द से कराह रहे हैं। एक साथी पर जांच एजेंसी की कार्रवाई को गैरकानूनी ठहराते हुए आरपार की लड़ाई का ऐलान कर दिया। साहब लोगों के सम्मान पर सीधी चोट लगी तो आंदोलन पर डटना स्वाभाविक भी था।
लेकिन अंदर वाले अंदर की बात कुछ और ही बताते हैं। अंदर वालों का कहना है कि कुछ साहब लोग इसलिए ज्यादा चिंतित हैं कि कहीं जांच एजेंसी के हाथ उन तक न पहुंच जाएं। इसलिए जोरशोर से विरोध करने में लगे हैं। अब ‘सरकार’ के सामने मांगों का पिटारा रख दिया है। बता रहे हैं कि ये जांच एजेंसी का विरोध और यह सब अपने लिए सुरक्षा कवच बनाने की जुगत है।