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सरकार में क्या मिला...बाबा जी का ठुल्लू

Sun, 25 Jan 2015 03:06 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड में लालबत्ती की चाहत रखने वाले आहत हैं। सीएम दरबार से तारीख पर तारीख मिल रही है। वैसे तो सीएम के इर्द-गिर्द जो चेहरे दिखाई देते हैं सब सेट हो गए हैं। बस एक ही हैं जो खुद को पिछड़ा महसूस कर रहे हैं।
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उनका दर्द भी रह रहकर उभर आता है। अपने समर्थकों के बीच तो उनके सब्र का बांध टूट गया। बोले तुम कहते हो सरकार हमारी है, सरकार कहती है तुम हमारे हो, लेकिन इस सरकार में मुझे क्या मिला है बाबा जी ठुल्लू।

कुमाऊं के एक लालबत्तीधारी की तरफ इशारा कर कहते हैं देखो पंडित जी को प्रबंधन का जिम्मा मिल ही गया। अरे भाई मैं भी तो दुख के दिनों का साथी रहा हूं।

साहब बन के कुर्सी छिन गई
बाबू से अफसर तो बन गए लेकिन अफसरी नहीं मिल रही है। एक बरस हो गया न कमरा है न कुर्सी। सचिवालय के बगल में खड़ी आलीशान इमारत (योजना भवन) को कोसा करते हैं। अपना दुखड़ा सबको सुना चुके लेकिन समाधान नहीं निकला।
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समाधान से याद आया कि पदोन्नति पाने वाले इन्हीं सचिवों के अनुजों के पास सरकार के ऑनलाइन समाधान का जिम्मा भी है। बेचारे एक बरस से अपने बैठने का ठिकाना तो ढूंढ नहीं पा रहे ऑनलाइन होकर जन समस्याओं का समाधान कैसे करेंगे।

दूसरे की कुर्सी पर बैठकर फाइल निपटाने को मजबूर हैं। सरकार कार्यसंस्कृति बदलने की दुहाई दे रही है पर उसके दिल (सचिवालय) की धड़कन सुनाई नहीं दे रही। पदोन्नत 60 अनुसचिव हैं जो एक बरस से वाहन पार्किंग या किसी पेड़ के नीचे या फिर साथियों के कमरे में एक कोना पकड़कर बैठे हैं।

दिल्ली का मिशन दून में वैंटीलेटर पे
दिल्ली से मिला सेहत का राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन देहरादून में बीमार पड़ा है। उसे वैंटीलेटर से उठाकर तंदुरूस्त बनाने के लिए सियायत दां तो तैयार हैं लेकिन अफसरशाही उसका दम निकालने में जुटी हुई है।

एक बरस से कभी साहब तो कभी मैडम को कुर्सी पर बैठाया जा रहा है, लेकिन महानिदेशालय से चलने वाला राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) अब सचिवालय में कैद है। फाइलों को गाड़ियों में भरकर लाने की प्रक्रिया शुरू हुई तो फाइलें लापता होने लगीं।

पहाड़ के लिए देहरादून में बनी योजनाओं पर दिल्ली की मुहर लगी लेकिन अब उनको पहाड़ चढ़ाने में दम फूल गया है। बड़ी उम्मीद से नए साहब को कुर्सी पर बैठाया गया है पर उनके सीने में अधिकारों का वही दर्द उठने लगा है जिसके चलते पुराने साहब ने कुर्सी छोड़ दी थी।

शादी या शक्ति प्रदर्शन
देहरादून एक विशेष विवाह समारोह का गवाह बना। बेटी की शादी पर पूर्व मुख्यमंत्री की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विवाह स्थल तक पहुंचने के लिए बड़े-बड़े वीवीआईपी भी हूटर की आवाज पर फर्राटा नहीं भर सके।

देहरादून के बीचों बीच स्थित विवाह स्थल बन्नू इंटर कॉलेज तक पहुंचने के लिए लोगों ने खासी मशक्कत की। न सिर्फ उनकी पार्टी के बड़े-छोटे नेता पहुंचे बल्कि दूसरी पार्टियों के दिग्गज भी प्रिय नेता को शिकायत का मौका नहीं देना चाहते थे।

लिहाजा विवाह स्थल को जाने वाले सभी प्रमुख मार्ग रेसकोर्स, धर्मपुर, सुभाष रोड, हरिद्वार रोड पर सिर्फ और सिर्फ शादी में पहुंचने वालों के वाहनों के बीच कशमकश दिखी। विवाह स्थल के आसपास पार्किंग की मारामारी। ऐसे में राजनेताओं की जुबान पर एक ही जुमला था बेटी की शादी है या शक्ति प्रदर्शन।
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