एक बड़ी मोबाइल कंपनी के अधिकारी हैं। वह रोज अपनी सेवाओं के सबसे श्रेष्ठ होने का दावा करते-करते उनकी जुबां नहीं थकती थी, लेकिन बीते सप्ताह अपनी ही जुबां से सेवाओं का ‘सच’ उगल गए।
हुआ यूं कि घर से पत्नी फोन लगा रही थीं, लेकिन सिग्नल कम होने के चलते उनकी ठीक से बात नहीं हो पाई। बार-बार काल ड्राप हो रही थी। पत्नी की जुबां खुली तो अधिकारी महोदय की बोलती बंद हो गई।
उन्हें तभी सांस-में-सांस आई जब पत्नी जी का फोन बंद हुआ। फिर क्या था, अपनी कंपनी के सिग्नल को इतना गरियाया कि सुनने वाले भी कह बैठे-साहब संभल के, दीवारों के भी कान होते हैं। कोई सुन न ले।