घटनाओं में एक जैसा ही पैटर्न
वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ.पंकज चौहान बताते हैं कि हिमनद झील के टूटने से केदारनाथ (2013), ग्लेशियर और रॉक टूटने से चमोली (2021) में आपदा आई थी। पिछले वर्ष धराली (2025) में पानी मलबा ऊंचाई से आया था, जिससे तबाही मची थी। अब नेपाल में घटना हुई। अगर इन घटनाओं को देखें तो एक पैटर्न कॉमन रहा है। संकरी घाटी, तेज ढलान होने के कारण पानी के साथ मलबा-बोल्डर से तेजी से नीचे की तरफ आए। इसके साथ उन्होंने रास्ते में और चट्टानों को काटते गए। इसके साथ मलबा बढ़ता गया और उसने डाउन स्ट्रीम में भारी तबाही हुई।
तापमान में बढ़ोतरी, जलवायु परिवर्तन से ग्लेशियर पिघल रहे
ग्लेशियर पिघल रहे, इससे हिमालयी क्षेत्र में नई झीलें बन रही हैं और पुरानी झीलें बड़ी हो रही हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के अनुसार 2016-2017 के दौरान पहचानी गई 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 झीलों में से 676 झीलें हैं, उनका आकार 1984 के बाद से बढ़ा है। इसमें 601 झीलों का आकार अपने मूल आकार से दोगुना से अधिक बढ़ा है। 10 झीलें डेढ़ से दो गुना बढ़ी और 65 झीलों का आकार डेढ़ गुना बढ़ा है। वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक मनीष मेहता बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन और न्यूनतम तापमान में बढ़ोतरी के चलते ग्लेशियर पिघलने के साथ पीछे की तरफ जा रहे हैं। इससे हिमनद झीलें बन रही हैं या जो हैं उनके आकार में बढ़ोतरी हो रही है। इसके अलावा अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बारिश हो रही है।