नवरात्र पर अष्टमी और नवमी पर लोग कन्या पूजन करते हैं लेकिन अब इसके लिए कन्याएं ही नहीं मिलती हैं। यही वजह है कि अब लोग अनाथ आश्रमों और मंदिरों में जाकर कंजक पूजन करते हैं, जबकि कुछ साल पहले तक ऐसा नहीं था।
पहले लोग आसपास के घरों से कन्याओं को बुलाकर उनकी पूजा करते थे लेकिन अब माता-पिता अपनी बेटियों को भेजने में हिचकते हैं। अभिभावकों को बेटियों के न भेजने के पीछे उनकी जहां उनकी सुरक्षा की चिंता है वहीं नए सामाजिक परिवेश में तैयार हुए बच्चे खुद भी ऐसे आयोजनों में जाना कम ही पसंद करते हैं।
लेकिन इसी के साथ वे गरीब बच्चे जो झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं वे ऐसे आयोजनों का इंतजार करते रहते हैं। इन बच्चों के लिए ये दिन अच्छा खाने-पीने और उन तोहफों को पाने का दिन होता है जिनके वह सपने देखते हैं।
बच्चों की सुरक्षा है अभिभावकों की चिंता
रायपुर रोड निवासी डा. श्रवि अमर अत्रि कहती हैं कि मेरी छह वर्षीय बेटी को कई लोगों ने बुलाया। लेकिन उसे अकेले भेजने से पहले दो बार सोचा। आखिर में मुझे उसके साथ जाना पड़ा। आज के दौर में माता-पिता बेटी के प्रति असुरक्षा का भाव रखते हैं, जबकि बच्चे भी अकेले जाना नहीं चाहते।
जीएमएस रोड निवासी साधना अरोड़ा बताती हैं कि जब उनकी बच्चियां छोटी थीं पूजन में जाती थी और शाम को घर आती थीं लेकिन हमें कभी चिंता ही नहीं होती थी। अब हालात बहुत बदल गए हैं। अब देखती हूं, मम्मी-पापा बाहर इंतजार करते रहते हैं या साथ जाते हैं।
स्वद्धार आश्रम की संचालिका कल्पना कहती हैं कि बच्चियों को भेजने से मना तो नहीं कर सकते, लेकिन सुरक्षा का ख्याल हमारा फर्ज है। कोई बच्चियों को पूजन के लिए ले जाता है तो उसका पूरा नाम, पता, फोन नंबर दर्ज करते हैं। यह जिम्मेदारी देते हैं कि बच्चियों को आश्रम तक छोड़ना होगा। देरी हुई तो फोन करते हैं या खुद बताए पते पर जाते हैं।
इन चेहरों को रहता है इस दिन का इंतजार
मैले-कुचले कपड़े और रूखे-सूखे बाल, चेहरे पर ढेर सारी गंदगी, लेकिन आज उनकी पूजा की गई। पैर धोए गए और उपहार दिए गए।
ये वे बच्चियां थीं जो भीख मांगती हैं या कूड़ा बिनती हैं लेकिन मंगलवार को नवरात्र का दिन इनके लिए खुशियां लेकर आया। लोग मंदिरों के बाहर भिखारी बच्चियों को बुलाकर घर ले गए। उनकी पूजा की गई, तोहफे दिए गए।
पांच साल की आरती, साढ़े तीन साल के भाई सोनू के साथ रोज बाजार में भीख मांगती थी। आरती ने बताया कि वह कन्या पूजन वाले दिन सुबह ही मंदिर आ जाती है। लोग खाना और पैसे ही नहीं देते, बल्कि घर ले जाकर तोहफे भी देते हैं।
सोनी, पिंकी, मीनू भी आसपास की बस्तियों में रहती हैं। मंगलवार सुबह से गीता भवन, शाकुंभरी देवी, पृथ्वीनाथ मंदिर समेत शहर के अन्य मंदिरों में घूमती रही।