प्रो. पंत ने बताया कि हिमालयी क्षेत्र अब तक स्थायित्व प्राप्त नहीं कर पाया है और भूकंपीय दृष्टिकोण से संवेदनशील है। तिब्बत की ओर खिसक रहा भारत का भाग उसमें समा नहीं पा रहा है जिस कारण भूगर्भीय टेक्टोनिक प्लेट्स की हलचल और तीव्र हो जाती है।
प्रो. पंत ने कहा कि भूगर्भीय हलचल को न तो रोका जा सकता है न ही भूकंप का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है इसलिए इसके प्रति जागरूक और सावधान रहना ही एकमात्र उपाय है।
उन्होंने कहा कि विश्व के तमाम देश इस दृष्टिकोण से संवेदनशील हैं जिनमें जापान, इंडोनेशिया, पैसिफिक क्षेत्र के देश, जर्मनी, स्विटजरलैंड, ईरान, इराक सहित पाकिस्तान से अफगानिस्तान जाने वाला चमन फाल्ट के क्षेत्र शामिल हैं। विकसित देशों ने निर्माण से लेकर आपदा प्रबंधन की उच्च तकनीक अपना कर इससे होने वाली क्षति को कम करने में सफलता प्राप्त की है।
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में पत्थरों से निर्मित होने वाले भवन भूकंपरोधी थे। इनकी दीवारों के बीच में लकड़ी के तख्ते डालने से यह और भी सुरक्षित हो जाते थे जिनके गिरने का खतरा और भी कम हो जाता है। यह अफसोस कि बात है कि आधुनिकता की दौड़ में अब यह तकनीक ही समाप्त हो चुकी है। सुदूरवर्ती गांवों में भी लेंटर वाले भवन बन रहे हैं।
प्रो चारु पंत का कहना है कि लेंटर वाले भवन में भी केवल एक अतिरिक्त सरिया के उचित प्रयोग से भूकंप में भवन के गिरने का खतरा कम किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि खिड़की व दरवाजों की चौखट के ऊपर एक या दो सरिया की बीम से भवन के गिरने के खतरे को बहुत कम किया जा सकता है।
सरोवर नगरी में मंगलवार की शाम पाइंस लेकर अयारपाटा तक भूकंप के हल्के झटके महसूस किए गए। इस दौरान कहीं भी जानमाल के नुकसान की खबर नहीं है, अलबत्ता कई लोग घरों से बाहर भी निकल आए। पाइंस निवासी मनमोहन त्रिपाठी ने बताया कि चंद सैकेंड के लिए ही भूकंप का झटका महसूस किया गया।
तल्लीताल निवासी देवेंद्र सिंह व मोहन सिंह ने भी भूकंप के झटके को महसूस किया। मल्लीताल निवासी किशन सिंह और उनके साथ बैठे लोगों ने भी धरती के डोलने की आहट महसूस की।
वहीं अयारपाटा निवासी और कुविवि के सूचना वैज्ञानिक युगल पंत ने भी झटके को महसूस किया। जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी शैलेश कुमार ने बताया कि शाम 7:01 बजे के आसपास भूकंप के झटके महसूस किए गए। जिसका केंद्र नेपाल में और तीव्रता 5.1 आंकी गई है।