संतों ने फैसला लिया है कि कुरुक्षेत्र की तर्ज पर हरिद्वार में विशाल गंगा संग्रहालय का निर्माण किया जाएगा।
अरबों रुपए होंगे खर्च
जयराम आश्रम में पीठाधीश्वर ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी के संयोजन में हुई बैठक में षड्दर्शन संतों, अखाड़ों और महामंडलेश्वरों ने अर्द्धकुंभ तक संग्रहालय का कार्य शुरू करने की घोषणा की। इसमें अरबों रुपए खर्च होंगे, जिसका बड़ा हिस्सा साधु-समाज देगा।
प्रदेश सरकार ने इसके लिए आवश्यक भूमि देने पर सहमति दे दी है। संतों का एक प्रतिनिधि मंडल शीघ्र प्रधानमंत्री से भी भेंट करेंगा। बैठक में पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती ने गंगा संग्रहालय की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी ने देश के इस प्रकार के अनेक विख्यात संग्रहालयों का विवरण दिया। कहा कि सबको साथ लेकर यह संग्रहालय बनाना अब उनके जीवन का मकसद बन चुका है। जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर स्वामी उमाकांतानंद ने विश्व भर के संग्रहालयों के बारे में बताया।
महामंडलेश्वर डॉ. श्यामसुंदर दास, महामंडलेश्वर अर्जुनपुरी, महामंडलेश्वर हरि चेतनानंद, निरंजनी अखाड़े के सचिव रामानंदपुरी, महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव शिवशंकर गिरि, स्वामी ऋषिश्वरानंद, बड़े अखाड़े के मोहन दास, नया अखाड़ा उदासीन के महंत भगतराम, आह्वान अखाड़े के शिवशंकर गिरि, निर्मल अखाड़े के संत महेंद्र सिंह, गंगा सभा के कार्यकारी अध्यक्ष गांधीवादी पुरुषोत्तम शर्मा आदि ने इस बैठक में भाग लिया।
क्या होगा इस संग्रहालय में
इस संग्रहालय में गंगा के अवतरण, मार्ग, महत्व, संदर्भ आदि को प्रतिमाओं के माध्यम से बताया जाएगा। ध्वनि-प्रकाश माध्यम का उपयोग करते हुए भव्य स्टेज कार्यक्रम भी निरंतर चलेगा। गंगा से संबंधित संपूर्ण साहित्य संजोने के लिए विद्वानों की टीम गठित की जाएगी।
अब ‘हैलो’ की जगह ‘जय गंगे मैया’
गंगा सभा के अध्यक्ष पुरुषोत्तम शर्मा ने प्रस्ताव रखा कि हरिद्वार वासियों को फोन पर ‘हैलो’ की जगह फोन पर ‘जय गंगे मैया’ कहना चाहिए। मध्य भारत में जय श्रीकृष्ण, वृंदावन में राधे-राधे, अवध में राम-राम आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है।
हरिद्वार का सारा कारोबार गंगा पर आधारित है। यहां के निवासियों को हर-हर गंगे, जय श्रीगंगा जी अथवा जय गंगे मैया शब्दों का प्रयोग फोन उठाते ही करना चाहिए। संत समाज ने तत्काल दोनों हाथ उठाकर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। आज से ही फोन पर जय गंगे मैया शब्दों के प्रयोग के संदेश संतों द्वारा भेजे जा रहे हैं।