तब गंगा को पृथ्वी पर लाने का कोई मकसद भी नहीं रहता। गंगा के धरती पर आने वाले दिन जो दस योग विद्यमान थे, वे कलियुग में दशहरे के दिन कभी पूरे नहीं होते। लेकिन अधिकांश योग मिल जाते हैं। योग मिलने की इस संख्या पर ही गंगा दशहरे का पुण्य घटता बढ़ता रहता है।
धरती पर गंगा के आगमन का अवतरण पर्व गंगादशमी के रूप में हरिद्वार से गंगासागर तक समूचे गांगेय क्षेत्र में मनाया जाता है। गंगा आगमन अस्थियां और मृतकों की राख बहाने के उद्देश्य से हुआ। वैदिक विद्वान पंडित रविनंदन प्रभाकर के अनुसार गंगा और सरस्वती नदियों का उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है।
स्कंद पुराण का केदारखंड, मत्स्य पुराण और विष्णु पुराण गंगा अवतरण के आख्यानों से भरे हुए हैं। गंगा में अस्थि प्रवाह के प्रमुख केंद्रों के रूप में हरिद्वार, काशी और सोरों तीर्थ विख्यात हैं। गढ़मुक्तेश्वर, पटना, प्रयाग और गंगासागर में भी उन क्षेत्रों के निवासी अस्थि प्रवाह करते हैं। दशमी के पावन दिवस पर गंगास्नान का अपार महत्व है। दशहरा स्नान मोक्ष प्रदान करने वाला है।