उत्तराखंड राज्य बनने के 18 साल बाद भी यहां ताड़ीखेत प्रेम विद्यालय के पास स्थापित गांधी कुटिया उपेक्षा का दंश झेल रही है। महापुरुषों के नाम पर राजनीतिक रोटियां तो बहुत सेंकी जाती हैं, लेकिन उनकी याद में बने स्मारकों को भुला दिया जाता है। देश को आजाद कराने के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी 1929 में तीन दिवसीय प्रवास पर यहां ताड़ीखेत पहुंचे और उन्होंने आजादी के दीवानों में जमकर जोश भी भरा था।
देश को ब्रिटिश हुकूमत की बेड़ियों से मुक्ति दिलाने के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी 1920 के बाद से सक्रिय हो गए थे। आजादी को लेकर जनसमर्थन जुटाने के लिए राष्ट्रपिता 1929 में राष्ट्र भ्रमण के तहत यहां ताड़ीखेत पहुंचे। उनके ठहरने के लिए स्थानीय लोगों ने प्रेम विद्यालय के पास मात्र तीन दिनों के भीतर उनके लिए कुटिया बना दी थी। वह 17 से 19 जून तक यहां रहे।
रख रखाव के अभाव में यह जीर्ण-शीर्ण हालत में है
उस वक्त के जानेमाने आंदोलनकारी स्व. गोविंद बल्लभ पंत, हरगोविंद पंत, स्व. मोहन लाल शाह, देव सिंह कुवार्बी, हरी दत्त कांडपाल, राम दत्त पांडे, बद्रीदत्त पांडे सहित तमाम बड़े आंदोलनकारियों ने गांधी जी की अगवानी की। गांधी जी के जाने के बाद इस स्थान पर आंदोलन की लड़ाई की रणनीति बनने लगी।
वहां आंदोलनकारियों को प्रशिक्षण तक दिया जाता था। यहां आंदोलन की अलख जलाने के बाद महात्मा गांधी कौसानी के लिए रवाना हो गए। आजादी के बाद से ही ऐतिहासिक गांधी कुटिया उपेक्षा का दंश झेल रही है। रख रखाव के अभाव में यह जीर्ण-शीर्ण हालत में है।
ब्लॉक प्रमुख रहते मैंने दो अक्तूबर की पूर्व संख्या पर मशाल जुलूस की प्रथा शुरू की है। विधायक बनने के बाद कुटिया का जीर्णोद्धार कराया। हाल ही में केएमवीएन के माध्यम से भी कुटिया का कुछ जीर्णोद्धार कराया गया है। प्रशासन को भी ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण की पहल करनी चाहिए।
करन माहरा, विधायक रानीखेत।