तांबे से पारंपरिक रूप से बने बर्तनों की कभी विणपन की कोई समस्या नहीं थी। स्थानीय स्तर पर लगने वाले मेलों में कारीगरों के हाथों से बने बर्तनों की काफी डिमांड रहती थी।
शादी व धार्मिक आयोजन में तांबे व पीतल से बने बर्तनों पर खाना बनता था। लेकिन अब धीरे-धीरे इसका प्रचलन खत्म हो रहा है। गागर, तौला, परात, सुरई, पंच पात्र, दीप दान, वाद्य यंत्र रणसिंह, तुतरी, ढोल, नगाड़े, वाटर फिल्टर, लैंप स्टैंड, घर के सजावटी सामान की अपनी अलग पहचान थी।
सरकार संरक्षण दे तो चकमेगा तांबा उद्योग
बागेश्वर जनपद के ग्राम चौगांवछीना निवासी नवलकिशोर टम्टा बताते हैं कि पहले खरही क्षेत्र की पहचान ही तांबा उद्योग था। तब हस्तशिल्पियों की आय वेतनभोगी कर्मचारियों से अधिक होती थी। लेकिन अब यह व्यवसाय फायदेमंद नहीं रहा। मशीनीकरण के बाद रामनगर से तांबे के सस्ता बर्तन आने से भी कारोबार को नुकसान हुआ है। सरकार इस प्राचीन उद्योग को संरक्षण व विपणन की व्यवस्था करे तो पहाड़ों से पलायन रुकेगा।