1. लोगों का लगाव वनों के प्रति कम हो रहा है। ऐसे में वन संरक्षण के मामले में वन विभाग को अपने संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ रहा है जो कि काफी कम हैं।
2. शहरीकरण और विकास योजनाओं के लिए वन भूमि की दरकार है। 2015 से लेकर 2019 के बीच में करीब 2850 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग विकास कार्य के लिए किया गया।
3. वनों पर प्रदेश के कई लोगों की निर्भरता लगातार बनी हुई है। लकड़ी के अलावा चारा, जड़ी बूटी आदि भी वनों से लिया जा रहा है।
4. जल स्रोतों का कम होना भी वनों के स्वास्थ्य के सामने बड़ी चुनौती है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट में भी इस ओर इशारा किया गया है।
5. वन पंचायतों का अधिकतम उपयोग न होना पाना भी एक चुनौती है। प्रदेश में 12000 से अधिक वन पंचायतें हैं और इनके अधीन 7.32 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र इनके अधीन हैं।
करीब 61 प्रतिशत वन अति संवेदनशील
एक शोध के मुताबिक प्रदेश में करीब 61 प्रतिशत वन वनाग्नि, भू कटाव सहित अन्य समस्याओं को लेकर अति संवेदनशील हैं। इसी तरह 36 प्रतिशत वन संवेदनशील पाए गए हैं। साफ है कि वनों की सेहत पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में प्रदेश को अपनी बहुमूल्य वन संपदा का नुकसान उठाना पड़ सकता है।
वनों पर दबाव बढ़ने से इनकार नहीं किया जा रहा है। प्रदेश में इस समस्या के समाधान के कोशिश भी की जा रही है। लेंटाना, काला बांस सहित अन्य खरपतवार को समाप्त करना, पौधरोपण आदि को तवज्जो दी जा रही है। वनाग्नि एक बड़ी समस्या है। इस बार विश्व वानिकी दिवस पर स्वस्थ वन, स्वस्थ जीवन का स्लोगन इसलिए दिया गया है।
- राजीव भरतरी, मुखिया वन विभाग