कैसे हुआ ये प्रयोग
वन्य उत्पादों को आदिवासी लोगों की आजीविका से जोड़ने के लिए एक योजना तैयार कर केंद्र सरकार को भेजी गई। वन मंत्रालय ने इस योजना के लिए तीन करोड़ रुपये की आर्थिक मदद के साथ 1809 हेक्टेयर वन क्षेत्र चिन्हित किया। विद्यापीठ ने जनजातियों का समूह बनाकर व्यावसायिक गतिविधियों से जोड़ा। इसके बाद जिला प्रशासन की मदद से इनकी ट्रेनिंग शुरू हुई।
ग्रामीणों को एक सप्ताह विश्वविद्यालय और दो सप्ताह जंगल में प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके बाद गांव-गांव में गौण वन उत्पाद समितियों का गठन किया गया। आज यह जनजातीय लोग तेंदु पत्ता, महुवा, बिहाड़ा, गोंद, ब्लैक बेरी, शहद जैसी वनोपज को बेचकर इससे अच्छी खासी आमदनी प्राप्त करते हैं।
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अब तक 1478 ग्राम पंचायतों के हजारों लोगों को इस योजना जोड़ा जा चुका है। समितियों का बकायदा जिला प्रशासन के साथ एमओयू किया गया है। जिला प्रशासन इन उत्पादों को लेकर आगे बाजार में बेचता है। इसके लिए बाकायदा कुलपति की अध्यक्षता में गौण वन उत्पाद अध्ययन बोर्ड का गठन किया गया है।