कम खाने वाले लोगों के लिए चिड़ियों जैसी खुराक का ताना दिया जाता हो पर अब इन चिड़ियों के पेट पर भी संकट मंडरा रहा है।
चिड़ियां जिन फल आदि को खाती थीं, उनके वृक्ष कम हो गए हैं। उत्तराखंड में अब जंगलात ने ऐसे वृक्षों को नर्सरी में विकसित कर जंगल में लगाने की योजना बनाई है।
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शहर में कंक्रीट का जंगल बढ़ने और वृक्षों की संख्या कम होने के कारण घरेलू चिड़ियों का आवास छिन गया। आस केवल जंगल की तरफ थी।
कई प्रजातियों पर संकट
लेकिन, जंगलात में बीते सालों में प्रोडेक्शन फॉरेस्ट्री (सागौन, पापुलर और यूकेलिप्टस) को बढ़ावा देने समेत अन्य दूसरे कारणों से फालसा जैसी कई प्रजातियां संकट में पड़ गईं।
अब जंगलात को चिड़ियों के पेट की भी चिंता हो गई है। इसके तहत लुप्त होने वाले और चिड़ियों के लिए महत्वपूर्ण प्रजातियों को वन अनुसंधान शाखा ने नर्सरी में विकसित करने का काम शुरू किया है।
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नर्सरी में तैयार होंगे पेड
मुख्य वन संरक्षक अनुसंधान एसके सिंह कहते हैं कि चिड़ियां जिन प्रजातियों के फल आदि को खाती है, उसमें से कई चारा प्रजाति हैं।
इन पर दबाव बहुत होने से इनकी संख्या में कमी आई है, जिसे ध्यान में रखते हुए महकमे ने 4000 फीट की ऊंचाई पर मिलने वाले भीमल से लेकर तराई के जंगलों में मिलने वाली धामन, गुड़ भेली, कट-भीमल, फालसा-धामन आदि को नर्सरी में विकसित किया जा रहा है, जिसे बाद में जंगल में लगाया जाएगा। यह प्रजातियां जैव विविधता की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।