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उत्तराखंड में आकर विदेशी सीख रहे खेती-किसानी

Wed, 28 Oct 2015 04:38 PM IST
बिशन सिंह बोरा / अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड के युवाओं का भले ही खेती के प्रति आकर्षण कुछ कम हो गया हो, लेकिन विदेशी दून में आकर खेती-किसानी सीख रहे हैं।
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परंपरागत बीजों के संरक्षण और जैविक खेती के रूप में देश और दुनियाभर में पहचान बना चुके दून के रामगढ़ में विदेशी जैविक खेती की जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। दून के शिमला बाईपास रोड स्थित रामगढ़ नवधान्य केंद्र में फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका, इंग्लैंड सहित विभिन्न देशों के युवा मिट्टी की सेहत से लेकर परंपरागत जैविक खेती की जानकारी ले रहे हैं।

हाल ही में यहां 21 देशों से पहुंचे युवाओं की टीम ने ए टू जेड जैविक खेती के पांच सप्ताह के कोर्स को पूरा किया है। अब सात देशों के युवा मंडुआ, झंगोरा, धान की विभिन्न प्रजातियों, दालों एवं बीजों के संरक्षण की जानकारी पाने के लिए पहुंचे हैं।
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नवधान्य केंद्र के कार्यकारी निदेशक डॉ. विनोद भट्ट बताते हैं कि पांच सप्ताह की जैविक एवं मिश्रित खेती किसानी की क्लास में किसानों को मिट्टी, बीज, जैविक खेती क्यों और कैसे करें, भोजन कैसा और क्यों उपयोगी हो, यह सब जानकारी दी जाती है।

इन देशों के हैं लोग
इन दिनों फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, इजराइल आदि देशों के लोग जैविक खेती किसानी सीख रहे हैं।

मिश्रित खेती बनी वरदान
रामगढ़ में किसानों के लिए गेहूं और सरसों की मिश्रित खेती वरदान साबित हो रही है। घटती भूमि पर यह खेती फायदेमंद है, इससे एक ही समय पर दो फसलें ली जा सकती हैं।
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जैविक खेती को बढ़ावे के लिए प्रिंस चार्ल्स भी आए थे यहां
विदेश की विभिन्न यूनिवर्सिटियों के शोध छात्र जैविक खेती और परंपरागत बीजों के संरक्षण पर शोध के लिए रामगढ़ नवधान्य केंद्र आते हैं।

1996 में स्थापित इस केंद्र में वर्ष 2013 में इंग्लैंड के प्रिंस, प्रिंस चार्ल्स जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए यहां आ चुके हैं। इसके अलावा प्राकृतिक खेती के जनक रहे जापान के फूकोका भी यहां आ चुके हैं। प्रसिद्ध पर्यावरणविद डॉ. वंदना शिवा बताती हैं कि केंद्र में बीजों की विभिन्न प्रजातियों को संरक्षित कर रखा जाता है।
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