उत्तराखंड में विदेशी पशु प्रजनन केंद्र स्थापित करने का मकसद तो काफी अच्छा था, लेकिन कदम लड़खड़ा गए। लापरवाही और अव्यवस्था अच्छे मकसद को लील गई।
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15 नवंबर 1979 को भराड़ीसैंण में विदेशी पशु प्रजनन केंद्र की स्थापना की गई थी। गैरसैंण से 12 किमी दूर भराड़ीसैंण में स्थापित विदेशी पशु प्रजनन केंद्र को प्रदेश में ही क्या, तब एशिया में अपनी तरह का पहला संस्थान कहा गया था।
केंद्र का मुख्य उद्देश्य पशुपालकों को उन्नत नस्ल के पशु मुहैया करवाकर दूध उत्पादन को बढ़ावा देना था। ताकि लोगों की आर्थिक स्थिति ठीक हो सके।
इसके लिए लाखों की लागत से डेनमार्क से जर्सी गायें और सांड मंगाए गए। जिससे स्थानीय स्तर पर ही बेहतर नस्ल की गायें पैदा हों और किसान लाभान्वित हो सकें।
शुरुआत में केंद्र ने अच्छा काम भी किया। लेकिन बाद में उदासीनता हावी हो गई और अपनी तरह का यह अकेला संस्थान कुछ ही वर्षों में बदइंतजामी का शिकार हो गया। विदेशी पशु प्रजनन केंद्र में फिलहाल ऐसी कोई गतिविधि अमल में नहीं लाई जा रही।
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सांड दिए, उनकी भी सेहत कमजोर
केंद्र का उद्देश्य अच्छी नस्ल के पशु किसानों को कम से कम दरों पर उपलब्ध कराना था, ताकि किसान पशुपालन और दूध उत्पादन से अपनी आर्थिक स्थित मजबूत कर सकें।
लेकिन केंद्र से अभी तक ऐसा एक भी पशु शायद ही किसी किसान या पशुपालक को दिया गया हो। हां केंद्र ने कुछ सांड 15-15 हजार रुपये में जरूर बेचे। लेकिन ये सांड भी सेहत की दृष्टि से कमजोर हैं।
जमीन खाली, घास तक खरीदते हैं स्थापना के 35 वर्षों के बाद भी विदेशी पशु प्रजनन केंद्र को पशुपालन विभाग पहचान नहीं दिला पाया। केंद्र के पास 398 एकड़ भूमि है। लेकिन कुछ ही नाली पर कार्यालय, कर्मचारियों के निवास और दो बड़ी गौशाला बनी है। बाकी जमीन खाली पड़ी है। इस पर कंटीली झाड़ियां उगी हैं।
विभागीय स्तर पर इस खाली भूमि पर कभी चारा उगाने तक की कोशिश नहीं की गई। आलम यह है कि यहां पशुओं के लिए चारा व घास भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होती।
केंद्र के पशुओं के लिए रुद्रपुर से वर्षभर में 35 लाख रुपए से अधिक का चारा मंगाया जाता है। केंद्र की बदहाली के लिए विभाग के साथ-साथ प्रदेश सरकारों की अनदेखी भी जिम्मेदार है।
खर्च एक करोड़ से अधिक, आय 18-20 लाख विदेशी पशु प्रजनन केंद्र में एक परियोजना निदेशक, एक चिकित्साधिकारी, दो स्टॉक मैन सहित कुल 23 लोगों का स्टाफ है। केंद्र का प्रतिवर्ष खर्च करीब एक करोड़ रुपये बताया जा रहा है।
केंद्र के पास वर्तमान में 190 पशु हैं। इनमें 33 गाय दुधारू हैं, 65 बछिया हैं, 57 सांड व अन्य छोटे पशु हैं। दूध, गोबर, खाद आदि से केंद्र की प्रतिवर्ष आय 18 से 20 लाख रुपए तक हो रही है।
वर्ष 1979 में विदेशी पशु प्रजनन केंद्र की स्थापना पर लगभग दो करोड़ रुपए खर्च हुए थे। इस धनराशि से मुख्य कार्यालय, दो बड़ी गौशाला के साथ कर्मचारियों के लिए क्वार्टर बनाए गए थे।
केंद्र में सिर्फ एक विशेषज्ञ चिकित्सक
विदेशी पशु प्रजनन केंद्र में इस समय 190 से अधिक पशु हैं। लेकिन सिर्फ एक विशेषज्ञ चिकित्सक, दो पशुधन प्रसार अधिकारी, दो स्टॉक मैन, 13 पशुधन सहायक अधिकारी, एक डेयरी इंचार्ज, एक वेटनरी ऑफिसर हैं। कार्यालय में मुख्य लेखाकार सहित चार पद रिक्त हैं। तकनीकी स्टाफ भी नहीं है।
लाखों रुपए में खरीदी गई, अब शोपीस पशु प्रजनन केंद्र के लिए नब्बे के दशक में यहां पशुओं के लिए त्वरित चारा उगाने वाली फामेटा मशीन खरीदी गई थी। जर्मनी से लाखों रुपये में खरीदी गई इस मशीन से कुछ समय तक तो लाभ मिला।
लेकिन कस्टम ड्यूटी का भुगतान नहीं होने से इस मशीन को वर्ष 1994 में सीज कर दिया गया, जिसे छुड़ाया नहीं जा सका। मशीन दिवालीखाल-भराड़ीसैंण मोटर मार्ग किनारे पड़ी खराब हो रही है।
अब देने होंगे 18 लाख रुपए से ज्यादा फामेटा मशीन सीज करने का मामला चेन्नई हाईकोर्ट में चला। हाईकोर्ट ने कस्टम विभाग के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कस्टम ड्यूटी के रूप में 2 लाख रुपए विभाग को देने को कहा। फिर मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया।
सुप्रीम कोर्ट ने भी फैसला कस्टम विभाग के पक्ष में ही सुनाया। तब तक कस्टम ड्यूटी और जुर्माना मिलाकर कुल 18 लाख की देनदारी हो गई।
यदि अब मशीन शुरू कराने की पहल की गई तो 18 लाख रुपए से ज्यादा चुकाने होंगे। मजे की बात यह है कि फामेटा मशीन जब खरीदी गई थी तब इसकी कीमत 6 लाख रुपए थी।
वर्ष 1975 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा भराड़ीसैंण पहुंचे थे। यहां के प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर उन्होंने इसकी तुलना डेनमार्क से करते हुए पशुपालन का बड़ा संस्थान खोलने की बात कही थी।
उनके सपने को वर्ष 1979 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. शिवानंद नौटियाल ने भराड़ीसैंण में विदेशी पशु प्रजनन केंद्र स्थापित कर साकार किया था।
इस वर्ष 1 जून से यह केंद्र पशुपालन विभाग से हटाकर उत्तराखंड पशुधन विकास परिषद को सौंपा गया है। ऐसे में उम्मीद जगी है कि अब हालात कुछ सुधरेंगे।
1 जून से विदेशी पशु प्रजनन केंद्र भराड़ीसैंण उत्तराखंड पशुधन विकास परिषद के अधीन हो चुका है। उम्मीद है कि अब हालात सुधरेंगे। अभी आय बहुत कम हो रही है। लेकिन प्रयास किए जा रहे हैं कि जल्द ही केंद्र खर्चों के लिए दूध, खाद, गोबर की बिक्री से पर्याप्त राशि जुटा लेगा। फामेटा मशीन को भी चालू करने के प्रयास किए जा रहे हैं। - डॉ. एसके सिंह, परियोजना निदेशक, विदेशी पशु प्रजनन केंद्र भराड़ीसैंण (चमोली)