सतीश कुमार बलूनी
नेहरू कॉलोनी, देहरादून।
वैविध्यपूर्ण संस्कृति को समेटे उत्तराखंड में मेले आज अपनी असल पहचान खोते जा रहे हैं। कई मेलों को हालांकि आज सरकारी सहायता भी प्राप्त है लेकिन यह भी महज धम की बंदरबांट तक ही ज्यादा सीमित दिखाई पड़ते हैं।
इन मेलों का सरकारीकरण होने से इनकी वास्तविक पहचान गुम हो गई है। हां यह जरूर है कि आज के दौर में मेले वैसे ही अपनी पहचान खो रहे हैं लेकिन इसका कतई भी यह मतलब नहीं कि लोग मेलों में जाना ही नहीं चाहते।
एक दौर था जब मेले मिलन के प्रतीक के तौर पर होते थे। सुदूर पहाड़ों में लगने वाले इन छो-छोटे मेलों में लोग अपनों से मिलने के लिए पहुंचते थे अब वह तत्व मेलों से गायब है, हालांकि इनके मूल स्वरूप संग छेड़छाड किए बिना इन्हें लोकप्रिय बनाए रखा जा सकता है।
सरकार को चाहिए कि वह मेलों पर पैसा वास्तविक संस्कृति को पहचान दिलवाने में खर्च करे न कि महज इतिश्री के लिए।