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कोर्ट ने माना फ्लाईओवर बने ‘पब्लिक न्यूसेंस’

Wed, 02 Mar 2016 09:09 AM IST
मनीष चंद्र भट्ट / अमर उजाला, देहरादून
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देहरादून में फ्लाईओवरों के निर्माण में बरती जा रही लापरवाही से जनता की असुविधा पर कोर्ट ने कड़ा रुख अख्तियार किया है।
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नगर मजिस्ट्रेट की अदालत ने माना कि जिस तरह लोगों को असुविधा हो रही है वह पब्लिक न्यूसेंस की श्रेणी में आता है। बल्लीवाला और बल्लूपुर फ्लाईओवर निर्माण में देरी पर सिटी मजिस्ट्रेट कोर्ट ने प्रोजेक्ट प्रबंधन को नोटिस दिया है। अदालत ने चेताया है कि अगर अगली सुनवाई में विपक्षी पार्टी उपस्थित नहीं हुई तो एकतरफा फैसला सुनाया जाएगा। कोर्ट ने सुनवाई की अगली तिथि आठ मार्च तय की है।

बल्लीवाला और बल्लूपुर फ्लाईओवर का निर्माण कार्य लगभग चार साल पहले शुरू हुआ था। 31 दिसंबर 2014 तक निर्माण कार्य पूरा हो जाना चाहिए था। निर्माण सामग्री के सड़क पर फैले होने से यातायात बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है। इस पर प्रशासन ने कार्यदायी संस्था इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट इंडिया लिमिटेड (ईईपीएल) वसंत विहार और नेशनल हाईवे अथारिटी अधिकारियों के खिलाफ वाद दायर किया था।
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सिटी मजिस्ट्रेट कोर्ट र्में ईपीईएल के जीएम संजय गोयल, मैनेजर अजीत कुमार, एनएच रुड़की डिवीजन के ईई आरसी अग्रवाल और एएस भंडारी को पार्टी बनाया। मामले की सुनवाई करते हुए सिटी मजिस्ट्रेट ललित नारायण मिश्र की कोर्ट ने विपक्षियों के निर्धारित तिथियों पर पेश नहीं होने पर अब फ्लाईओवर प्रोजेक्ट के प्रभारी उप महाप्रबंधक आलोक श्रीवास्तव को नोटिस भेजा है।

प्रबंधन को भेजे नोटिस में कोर्ट कहा कि ‘फ्लाईओवर की निर्माण सामग्री काफी समय से मुख्य मार्ग पर पड़ी है, जिससे आवागमन प्रभावित हो रहा है। आपका उक्त कृत्य पब्लिक न्यूसेंस की श्रेणी में आता है।’ कोर्ट ने नोटिस के बावजूद नियत तिथियों पर कोर्ट में पक्ष न रखने पर नाराजगी जताई है। साथ ही इंस्पेक्टर कैंट को निर्देश दिए कि नोटिस को तामिल कर और निर्माणाधीन स्थल का निरीक्षण कर निर्माण सामग्री को हटाए जाने के संबंध में रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
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- सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत पब्लिक न्यूसेंस की वजह बन रही निर्माण सामग्री को जब्त करने के आदेश दे सकती है।
- निर्माण सामग्री हटाने में आया खर्च संबंधित विपक्षी एजेंसी से वसूला जाएगा।
- आदेश के बावजूद पब्लिक न्यूसेंस खत्म न करने पर आईपीसी की धारा 268 और 291 के तहत मुकदमे का प्रावधान है, जिसमें आरोपित को छह महीने की कैद या जुर्माना अथवा दोनों सजा हो सकती है।
(अधिवक्ता संजीव शर्मा के मुताबिक)
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