देहरादून में बांदल घाटी के दर्जनों गांवों का संपर्क 15 अगस्त की तबाही के बाद दुनिया से कट गया है। पढ़िए बांदल घाटी की लाइव रिपोर्ट...
तबाही का दर्द
‘कुछ पल पहले ये दोनों बारिश का मजा ले रहे थे। तब न इन्हें और न मुझे यह मालूम था कि अभी लुभा रही बारिश की ताजी बूंदें चंद मिनटों बाद हमें गहरे जख्म दे जाएंगी।’
आंखों में आंसू लिए चमनदास ने बेटे अजय और शुभम की ओर इशारा करते हुए तबाही का दर्द बयां किया। 15 अगस्त को उफनाई बांदल नदी ने उनका घर ही नहीं ढहाया, चार बीघा खेती को भी मलबे और पत्थरों के ढेर में बदलकर रख दिया।
अब चमन परिवार समेत प्राइमरी स्कूल में राहत सामग्री के भरोसे दिन काट रहे हैं। सरखेत निवासी चमनदास का घर नदी से करीब सौ मीटर दूर था। 15 अगस्त को बांदल नदी में पानी बढ़ने लगा तो ग्राम प्रधान ने सबसे पहले चमन को ही परिवार समेत सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए कहा।
चमन ने बताया कि वह पत्नी महेंद्री, बेटी रेखा और दोनों बेटों अजय, शुभम संग घर से कुछ सामान लेकर पास के स्कूल के लिए निकले। कुछ और सामान लेने फिर घर की ओर मुड़े थे कि नदी की लहरें उनके घर को लपक गईं। पौने चार बीघा खेतों में भी अब फसल की जगह वहां बड़े-बड़े पत्थरों और मलबे का ढेर ही बचा है।
पत्नी महेंद्री का रो-रोकर बुरा हाल है। चमन को भी बच्चों के भविष्य की चिंता सता रही है। चमन दास के परिवार ने आर्थिक सहायता की गुहार लगाई है। अभी अमर उजाला फाउंडेशन और हेस्को की ओर से दिए गए राशन से परिवार गुजर कर रहा है।
बेटी ने दी मां को दिलासा
चमन ने बताया कि ग्रामीणों ने घर खाली करने के लिए कहा तो उनकी पत्नी महेंद्री इसके लिए तैयार नहीं थी। उसका कहना था कि वह जीतेजी घर को छोड़कर कहीं नहीं जाएगी। ऐसे में उनकी बेटी रेखा ने मां को समझाया।
उसने कहा कि इस वक्त जान बचाना ज्यादा जरूरी है। परिवार साथ रहेगा, सब बचे रहेंगे तो भविष्य में जिंदगी के लिए मिल-जुलकर संघर्ष भी कर लेंगे। चमन ने बताया कि बेटी की यह बात पत्नी की समझ में आ गई और घर के नदी में बहने से चंद मिनट पहले परिवार सुरक्षित निकल गया।
प्रशासन की मदद हवाई ग्रामीण खुद बना रहे रास्ता
बड़ी बर्बादी के बावजूद शासन-प्रशासन का कोई नुमाइंदा अब तक बांदल घाटी के इन गांवों की सुध लेने नहीं पहुंचा है। मदद के दावे भी हवाई साबित हुए हैं। आखिर ग्रामीणों ने खुद ही रास्ते बनाने का काम शुरू कर दिया है।
सीतापुर, क्यारा, फुलेत, सिम्यारी, छमरौली, बौठो, भुस्ती, जमखाल, रमाली, ताछीला, घंतू का सेरा आदि ग्राम पंचायतों में न बिजली है और पानी। लोगों का जमा राशन भी अब खत्म होने लगा है।
पूर्व प्रधान विजेंद्र सिंह ने बताया कि शुरुआत के दो-तीन दिन तो अफसरों ने तेजी दिखाई, लेकिन अब कोई नहीं आ रहा। रास्ते बनाने का काम भी शुरू नहीं हुआ है। इससे ग्रामीणों ने खुद ही मिलकर रास्ते बनाने शुरू कर दिए हैं। हर रोज सुबह सैकड़ों ग्रामीण हाथों में गेंती, फावड़े लिए रास्ते बना रहे हैं।
ग्रामीण विकास उत्तरांचल जनकल्याण समिति के अध्यक्ष रामचंद्र नौटियाल ने जिलाधिकारी को ज्ञापन देकर बताया कि सेरकी-सिल्ला मोटरमार्ग क्षतिग्रस्त होने से 12 ग्राम पंचायतों के लोगों के सामने भूख से मरने की नौबत आ रही है। अतिशीघ्र सड़क न बनी तो धरना-प्रदर्शन किया जाएगा।
राशन लेने धनोल्टी बुलाया
आपदा से उजड़े इन गांवों के हालात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता कि शनिवार को क्यारा के लोगों को धनोल्टी बुलाकर राशन सामग्री बांटी गई।
कार्यवाहक तहसीलदार मनवर सिंह कंडारी ने बताया कि रास्ते कटे होने से गांव तक पहुंचना मुश्किल था। गांव के 125 परिवारों को प्रति परिवार 10 किलो चावल, एक किलो दाल, ढाई सौ ग्राम सरसों का तेल, आधा किलो नमक, 100 ग्राम मसाला दिया गया है।
अभी रास्ता बनने की उम्मीद नहीं
सरखेत के आगे के गांवों में अभी रास्ता बनने की कोई उम्मीद नहीं है। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अफसरों ने बजट न होने से हाथ खड़े कर दिए हैं।
सरखेत में काम कर रही एक जेसीबी शनिवार को खराब हो गई। बजट न आने से ठेकेदारों को काम आवंटित नहीं किया गया। बजट उपलब्ध कराने के संबंध में योजना के एसई ने डीएम को पत्र लिखा है।
विधायक ने पूछा काम क्यों रोका
सरखेत के पास सड़क निर्माण बंद होने पर विधायक गणेश जोशी ने जिलाधिकारी से जानकारी ली। बताया कि रास्ते न होने से दस गांवों का संपर्क कट गया है। प्रशासन हाथ पर हाथ रखकर बैठा है। इस पर जिलाधिकारी ने तुरंत कार्रवाई का आश्वासन दिया।