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एक्सक्लूसिव: हिमालयी क्षेत्र की मुख्य और सहायक नदियों में  विलुप्ति की कगार पहुंचीं 15 मत्स्य प्रजातियां 

Sat, 17 Oct 2020 02:16 AM IST
अलका त्यागी विनोद चमोली, अमर उजाला, चंबा (टिहरी)

सार

  • गढ़वाल विवि के स्वामी रामतीर्थ परिसर के वैज्ञानिकों की शोध रिपोर्ट
  • भागीरथी नदी में पाई जाती थी मत्स्य संपदा की 39 प्रजातियां, अब रह गई 24 
  • बदलते जलीय पर्यावरण, बांधों के निर्माण से नदियों की अविरलता हो रही बाधित हो रही 
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- फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर
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विस्तार
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हिमालयी क्षेत्र की मुख्य और सहायक नदियों की मत्स्य जैव विविधता पर संकट मंडरा रहा है। चार दशकों में भागीरथी नदी में 15 मत्स्य प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर पहुंच गई हैं। यही हाल भिलंगना, अलकनंदा और मंदाकिनी नदियों का है। गढ़वाल केंद्रीय विवि के स्वामी रामतीर्थ परिसर के जंतु विज्ञान के वैज्ञानिकों की शोध रिपोर्ट में यह बात सामने आई है। मत्स्य वैज्ञानिक इसके लिए बदलते जलीय पर्यावरण, बांधों के निर्माण से नदियों की बाधित अविरलता और अवैज्ञानिक दोहन को जिम्मेदार मानते हैं। 

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स्वामी रामतीर्थ परिसर के जंतु विज्ञान के मत्स्य वैज्ञानिक प्रो. एनके अग्रवाल ने गंगा और उसकी सहायक नदियों के पर्यावरण और मत्स्य जैव विविधता पर गहन शोध किया। उन्होंने पाया कि 80 के दशक में जहां भागीरथी नदी में मत्स्य संपदा की 39 प्रजातियां पाई जाती थी। वह अब घटकर 24 रह गई हैं। इसी प्रकार भिलंगना, अलकनंदा और मंदाकिनी नदियों में भी मत्स्य प्रजातियां कम हो गई हैं।

यह शोध रिपोर्ट देश की जानी-मानी नरेंद्रा प्रकाशन ने इसी माह अक्तूबर में प्रकाशित किया है। शोध में बताया गया है कि भागीरथी नदी के 65 किमी लंबाई वाले क्षेत्र में एक के बाद एक मनेरी भाली परियोजना, टिहरी और कोटेश्वर जल विद्युत परियोजना से नदी जलाशयों के रूप में परिवर्तित हो गई हैं। इस कारण पर्वतीय नदियों के तेज प्रवाह एवं नदीय पर्यावरण की अभ्यस्त मत्स्य प्रजातियां अपने को गहरे पानी की झील में नहीं ढाल पाने के कारण वहां से विलुप्त हो गई हैं। 

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विदेशी कामन कार्प प्रजाति की मछलियों की बढ़ रही तादाद

बांध बनने से पूर्व इस क्षेत्र की नदियों में स्नो ट्राउट, गार्रा, क्रोसोचिलस, ग्लिप्टोथौरेक्स, चीडो कैनिस सहित कई मछलियां नदी के तेज बहाव के साथ अभ्यस्त थी और नदी के तल पर पत्थरों के मध्य स्थित शैवाल और सूक्ष्म जलीय कीटों को खाकर जीवित रहती थी, लेकिन झील बनने के बाद यह स्थान समाप्त हो गए हैं।

इस कारण मछलियों का प्रजनन और भोजन स्थान विलुप्त हो गए हैं। वहीं टिहरी बांध बनने के बाद झील में विदेशी कामन कार्प प्रजाति की मछलियों की तादाद बढ़ रही है। प्रो.अग्रवाल ने कहा कि टिहरी झील में महाशीर प्रजाति के पिंजरा संवर्धन तकनीक द्वारा महाशीर संपदा के विकास की भी संभावनाएं हैं। उन्होंने बताया कि वह 2010 से इस पर शोध कर रहे हैं। बताया कि इस शोध में उनके साथ दो शोधार्थियों ने सहयोग किया।
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